
अमेरिका ने माइक्रोसॉफ्ट, इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, कॉग्निजेंट, HCL और कैपजेमिनी पर सख्ती बरती है। इन कंपनियों से जुड़े ग्रीन कार्ड प्रोग्राम PERM को सस्पेंड कर दिया है। अमेरिकी श्रम सचिव कीथ सोंडरलिंग ने कहा कि श्रम विभाग ने इन सभी कंपनियों के पर्म प्रोग्राम को निलंबित किया है। हम इन कंपनियों से जुड़ा कोई नया आवेदन स्वीकार नहीं करेंगे और न ही पहले से लंबित आवेदनों पर कोई कार्रवाई करेंगे।
रॉयटर्स के अनुसार, ट्रंप प्रशासन का मानना है कि इन कंपनियों ने धोखाधड़ी की है। साथ ही, इस कार्रवाई का मकसद इन कंपनियों द्वारा ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी लोगों को नौकरी मुहैया कराने की मुहिम है। राष्ट्रपति ट्रंप के इस फैसले को लेकर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ट्रंप प्रशासन एलन मस्क जैसे असाधारण विदेशी टैलेंट को आकर्षित करना चाहता है, लेकिन वह ऐसे इमिग्रेशन प्रोग्राम का इस्तेमाल नहीं होने देगा जिनसे अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशों से कम वेतन वाले कर्मचारियों को रखा जाए।
वेंस ने कहा कि अमेरिका असाधारण कौशल और काबिलियत वाले विदेशियों का स्वागत करता रहेगा, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि एच-1बी वीजा प्रोग्राम अपने मूल मकसद से भटक गया है। वीजा धोखाधड़ी पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि अगर लोगों के पास सच में बेहतरीन और खास हुनर है, तो वे अमेरिका आएं।
उनकी यह बात मस्क के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में आई, जिन्होंने अपना बिजनेस साम्राज्य खड़ा करने से पहले अमेरिका में पढ़ाई की थी और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था।
एक पत्रकार ने पूछा कि ट्रंप प्रशासन विदेशी कामगारों और शोधकर्ताओं के लिए मौके सीमित करते हुए अगले मस्क की पहचान कैसे कर सकता है। वेंस ने कहा कि विदेशी पेशेवरों पर विचार करते समय आव्रजन अधिकारियों को दो टेस्ट करने चाहिए। उन्होंने कहा कि पहला टेस्ट यह था कि क्या आवेदक ऐसी जगह भरेगा, जिसे कोई अमेरिकी कामगार नहीं भर सकता। दूसरा यह था कि क्या उस व्यक्ति में असाधारण काबिलियत है।
उपराष्ट्रपति ने एच-1बी आवेदनों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने के प्रशासन के फैसले का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि जो कंपनियां सच में असाधारण कामगार चाहती हैं, उन्हें उन्हें भर्ती करने के लिए ज्यादा पैसे देने को तैयार रहना चाहिए। वेंस ने आगे कहा कि अगर आप सच में किसी बेहतरीन, जीनियस-लेवल, सुपर-स्पेशलाइज़्ड व्यक्ति को अमेरिका ला रहे हैं, तो आप उस व्यक्ति को अपनी कंपनी में लाने के लिए थोड़ा ज्यादा पैसा देने को तैयार होंगे।
PERM प्रोग्राम अमेरिकी श्रम विभाग की एक प्रक्रिया है। इसमें आमतौर पर नियोक्ता को यह साबित करना होता है कि किसी नौकरी के लिए कोई योग्य, इच्छुक और उपलब्ध अमेरिकी कर्मचारी नहीं है। वह किसी पात्र विदेशी कर्मचारी को स्थायी नौकरी के लिए स्पॉन्सर कर सकता है। यह रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के लिए एक अहम चरण है। अमेरिकी श्रम विभाग के अनुसार, इस प्रमाणन से नियोक्ता किसी विदेशी कर्मचारी को अमेरिका में स्थायी रूप से नौकरी दे सकता है।
यह कदम भारतीय टेक प्रोफ़ेशनल्स के लिए अहम है, क्योंकि Infosys, TCS (टाटा), Wipro और HCL जैसी बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों का अमेरिका में बड़ा कारोबार है और वे वहां की कुशल-कर्मचारी इमिग्रेशन व्यवस्था के जरिए लोगों को नौकरी देती हैं।
H-1B प्रोग्राम भारतीय पेशेवरों के लिए बहुत जरूरी है। H-1B वीज़ा के सबसे बड़े उपयोगकर्ता टेक कंपनियां हैं। इसमें लगभग तीन-चौथाई मंजूरियां भारत के कर्मचारियों को मिलती हैं।
PERM की यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब ट्रंप प्रशासन विदेशी कर्मचारियों और अंतरराष्ट्रीय छात्रों के कार्यक्रमों की जांच बढ़ा रहा है। बुधवार को गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) में भाग लेने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर 70,000 डॉलर की फीस का प्रस्ताव रखा। OPT के तहत पात्र अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ाई के दौरान या उसके बाद अपने विषय से जुड़ी नौकरी कर सकते हैं। श्रम विभाग ने विश्वविद्यालयों से जुड़ी जांच भी शुरू की है। रॉयटर्स के मुताबिक, विभाग के इंस्पेक्टर जनरल ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों और वेतन से जुड़े आरोपों पर हार्वर्ड, येल और स्टैनफ़र्ड समेत नौ विश्वविद्यालयों को सम्मन जारी किए हैं।