जीन के बारे में वैज्ञानिकों ने एक नई रिसर्च से बड़ा दावा किया है। वैज्ञानिकों का इस बारे में क्या कहना है? आइए जानते हैं।
लंबी और स्वस्थ ज़िंदगी का राज़ मनुष्य के जीन में छिपा हुआ लगता है। इज़रायल के वेइज़मैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के वैज्ञानिकों की एक नई रिसर्च से पता चला है कि मानव जीवनकाल में आनुवंशिक (जेनेटिक) प्रभाव का योगदान लगभग 50% तक होता है। यानी माता-पिता से मिले जीन हमारी उम्र का आधा फैसला तय करते हैं। बाकी आधा हिस्सा लाइफस्टाइल, खान-पान, व्यायाम, पर्यावरण और किस्मत पर निर्भर करता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि लाइफस्टाइल अभी भी बहुत ज़रूरी है। स्वस्थ आदतें जीन के नकारात्मक प्रभाव को कम कर सकती हैं। परिवार में लंबी उम्र वाले लोगों की संतानें भी लंबे जीने की ज्यादा संभावना रखती हैं। यह नई सिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल 'साइंस' में हाल ही प्रकाशित हुई है।
पहले की ज़्यादातर रिसर्च में जीन का प्रभाव सिर्फ 20-25% या इससे भी कम (कुछ में 6-10%) बताया जाता था। लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि पुरानी रिसर्च में बाहरी मौतों (दुर्घटना, हिंसा, संक्रमण, बीमारियां) को अलग नहीं किया जाता था, जिससे जीन का असर छिप जाता था। नई रिसर्च में स्वीडन और डेनमार्क के जुड़वां बच्चों के पुराने और नए डेटा का विश्लेषण किया गया। जुड़वां बच्चे एक जैसे जीन वाले होते हैं, लेकिन अलग-अलग माहौल में पलने पर भी उनकी उम्र में अंतर आता है। वैज्ञानिकों ने गणितीय मॉडल के अनुरूप बाहरी मौतों को अलग कर प्राकृतिक बुढ़ापे पर फोकस किया। जिसमें जीन का योगदान 50% से ज्यादा निकला।
एक रिसर्चर ने बताया कि एक जैसे जीन और माहौल में भी लोग अलग उम्र में मरते हैं। कुछ 'प्रोटेक्टर जीन' बीमारियों से बचाव करते हैं, जिससे कुछ लोग बिना खास कोशिश के 100 साल पार कर लेते हैं। यह खुलासा एजिंग रिसर्च के लिए बड़ा है। इससे जीन-आधारित इलाज और लंबी उम्र की दवाओं की उम्मीद बढ़ी है।