
Taliban in Afghanistan: अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता संभालने के पांच साल पूरे हो चुके हैं। अगस्त 2021 को जब तालिबान लड़ाके काबुल में दाखिल हुए थे, तब दुनिया के सामने सवाल था कि क्या अफगानिस्तान फिर 1990 के दशक के कट्टरपंथी शासन की ओर लौटेगा। पांच साल बाद तस्वीर कुछ बदली हुई है। तालिबान सत्ता पर मजबूती से काबिज है, देश के बड़े हिस्से में उसका नियंत्रण है और क्षेत्रीय देशों के साथ उसके कूटनीतिक और आर्थिक रिश्ते भी बढ़े हैं। पश्चिमी देशों की ओर से आर्थिक और राजनीतिक दबाव के बावजूद तालिबान शासन ने अपनी विदेश नीति का रुख बदला और पड़ोसी तथा क्षेत्रीय शक्तियों के साथ संपर्क बढ़ाया। पांच साल बाद तालिबान ने यह साबित किया है कि वह अफगानिस्तान की सत्ता से आसानी से हटने वाला नहीं है। लेकिन सत्ता में बने रहना और एक स्थिर, समावेशी तथा स्वीकार्य शासन बन जाना दो अलग बातें हैं। चीन, रूस, ईरान, भारत और मध्य एशियाई देशों के साथ बढ़ते संपर्क इस बदलाव के संकेत हैं। रूस ने 2025 में तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता भी दी है।
तालिबान अपने शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में सुरक्षा और देश पर नियंत्रण को पेश करता है। लेकिन, अफगानिस्तान पूरी तरह हिंसा से मुक्त नहीं हुआ है। इस्लामिक स्टेट-खुरासान जैसे संगठन अब भी चुनौती बने हुए हैं। तालिबान और उसके विरोधी सशस्त्र गुटों के बीच भी छिटपुट संघर्ष जारी है। पड़ोसी पाकिस्तान के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट ने स्थिति को और जटिल कर दिया है। सीमा पार आतंकवाद के आरोपों को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है।
सत्ता पर पकड़ मजबूत होने के बावजूद अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था कमजोर बनी हुई है। विदेशी सहायता में कमी, बेरोजगारी, गरीबी और मानवीय सहायता की बढ़ती जरूरत ने आम अफगान की मुश्किलें कम नहीं होने दी हैं। ऐसे में तालिबान के सामने चुनौती केवल शासन चलाने की नहीं, बल्कि ऐसी अर्थव्यवस्था खड़ी करने की भी है।
तालिबान शासन की सबसे बड़ी पहचान महिलाओं और लड़कियों पर लगाए गए प्रतिबंध हैं। सत्ता संभालने के बाद लड़कियों के माध्यमिक और उच्च शिक्षा के रास्ते बंद किए गए। महिलाओं के रोजगार, आवाजाही और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर भी कठोर पाबंदियां लगाई गईं। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में अफगान महिलाओं और लड़कियों को व्यवस्थित तरीके से सार्वजनिक जीवन से बाहर किया गया है। उनकी स्वतंत्र आवाजाही पर भी पाबंदियां हैं। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में एक सर्वे में शामिल करीब आधी अफगान महिलाओं ने कहा कि वे महीने में केवल एक या दो बार ही घर से बाहर निकलती हैं। महिलाओं के लिए काम कर रहे संगठनों की स्थिति भी चिंताजनक है। तालिबान की मॉरल पुलिसिंग के कारण भी महिलाओं की स्थिति और खराब हुई है। संयुक्त राष्ट्र इसे दुनिया का सबसे गंभीर महिला अधिकार संकट बता चुका है।
भारत ने 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद उसे औपचारिक मान्यता नहीं दी, लेकिन अफगानिस्तान से पूरी तरह दूरी भी नहीं बनाई। अफगान में सत्ता परिवर्तन से पहले भारत अफगानिस्तान के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने के लिए काफी निवेश कर रहा था। अफगान संसद का निर्माण भी भारत ने ही किया। लेकिन, तालिबान का शासन आने के बाद कुछ समय के लिए दोनों देशों के रिश्तों में ठहराव भी आया। हालांकि समय के साथ नई दिल्ली ने तालिबान के साथ व्यावहारिक संपर्क बढ़ाया। 2022 में काबुल में भारतीय तकनीकी मिशन की वापसी इस दिशा में पहला अहम कदम था। बीते वर्ष जनवरी में तालिबान के विदेशमंत्री अमीर खान मुत्ताकी और भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री के बीच दुबई में बैठक से के बाद से भी संबंधों में सकारात्मक बदलाव आए। इस दौरान अफगान जनता के लिए मानवीय सहायता भी भारत ने जारी रखी। बीते साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले की तालिबान प्रशासन ने खुल कर निंदा की थी। अफगान से रिश्तों में भारत की चिंता केवल कूटनीतिक नहीं है। अफगानिस्तान में आतंकवादी संगठनों की मौजूदगी, पाकिस्तान की भूमिका, क्षेत्रीय सुरक्षा और मध्य एशिया तक पहुंच जैसे मुद्दे भारत की रणनीति को प्रभावित करते हैं।