
Thames River Revival: भारत जैसे देश में जहां नदियों को पूजा जाता है, मां का दर्जा दिया जाता है। वहां हर साल करोड़ों खर्च करने के बाद भी नदियां मैली बनी हुई हैं। गंगा का हाल किसी से छिपा नहीं है। इस पवित्र नदी को फिर से ‘जीवित’ करने के तमाम वादे हुए, योजनाएं चलाई गईं, पानी की तरह पैसा भी बहाया गया, लेकिन हालात नहीं बदले।
वैसे, नदियों के ‘दम तोड़ने’ की घटनाएं केवल भारत तक ही सीमित नहीं हैं। लंदन की मशहूर टेम्स नदी भी इस पीड़ा से गुजर चुकी है। फर्क बस इतना है कि टेम्स अब फिर से सांस ले रही है, जबकि हमारी नदियों के लिए सांस लेना अब भी मुश्किल है।
लंदन की टेम्स नदी को 1957 में जैविक रूप से ‘मृत’ घोषित कर दिया गया था। पानी में ऑक्सीजन की भारी कमी और दशकों तक सीवेज तथा औद्योगिक प्रदूषण के कारण जलीय जीवों के लिए यह मौत की नदी बन गई थी। स्थानीय सरकार ने नदी की पीड़ा को समझा, योजना तैयार हुई और उस पर तब तक गंभीरता से काम हुआ, जब तक कि टेम्स फिर से सांस न लेने लगे। आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। ये नदी फिर से शार्क, सील, समुद्री घोड़े, ईल मछलियों सहित अन्य जलीय जीवों का बसेरा बन गई है। जनवरी 2026 में जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन (ZSL) ने नदी के स्वास्थ्य को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें कहा गया कि टेम्स में उल्लेखनीय सुधार अब भी जारी है।
इस साल नदी को लेकर सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली खबरों में से एक यहां शार्क की मौजूदगी रही। फिलहाल टेम्स एस्ट्यूरी यानी नदी के मुहाने वाले क्षेत्र में शार्क की कम से कम पांच प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें टोपी और स्टाररी स्मूथहाउंड जैसी प्रजातियां शामिल हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि टेम्स का मुहाना छोटी शार्कों के लिए महत्वपूर्ण प्रजनन क्षेत्र हो सकता है। ZSL के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में ग्रेटर टेम्स एस्ट्यूरी क्षेत्र में करीब 2,987 ग्रे सील और 599 हार्बर सील मौजूद थीं।
2013 में व्यवस्थित निगरानी शुरू होने के बाद से ग्रे सील की संख्या तेजी से बढ़ी है। हालांकि हार्बर सील की स्थिति उतनी अच्छी नहीं है। इनकी संख्या 2017 में बढ़कर 796 हो गई थी, लेकिन उसके बाद घटकर 2013 के स्तर से भी नीचे चली गई। सील आश्चर्यजनक रूप से नदी के काफी अंदर तक जा सकती हैं। इन्हें मध्य लंदन में भी देखा गया है।
टेम्स के फिर से जीवित होने की गवाही एवोसेट नामक प्रवासी जलीय पक्षी भी दे रहा है। आवास नष्ट होने के कारण यह पक्षी 1842 तक ब्रिटेन में प्रजनन करने वाली प्रजाति के रूप में पूरी तरह गायब हो गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसने फिर से वापसी शुरू की और पिछले तीन दशकों में टेम्स के कुछ हिस्सों में इसकी आबादी दोगुने से भी ज्यादा हो चुकी है।
टेम्स नदी को फिर से उसके पहले वाले रूप में लाने के लिए लगातार अभियान चलाया गया और पूरी गंभीरता के साथ। सीवेज ट्रीटमेंट में सुधार, प्रदूषण पर सख्त नियंत्रण और दशकों तक चले संरक्षण प्रयासों ने धीरे-धीरे नदी को फिर से जलीय जीवन के लिए उपयुक्त बनाया। सुधार की प्रक्रिया 1990 के दशक में तेज हुई। इस दौरान वाटर इंडस्ट्री और शहरी क्षेत्रों में गंदे पानी के ट्रीटमेंट से जुड़े कड़े नियम लागू किए गए। इन नियमों के तहत सीवेज कंपनियों के लिए पर्याप्त कालेक्टिंग सिस्टम और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट मेंटेन करना अनिवार्य किया गया। 1996 में ब्रिटेन की एनवायरनमेंट एजेंसी को नदी की निगरानी और देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी गई। नदी में ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाने के लिए बड़े ऑक्सीजनेटर स्थापित किये गए। यह कदम मछलियों की आबादी बढ़ाने में भी मददगार साबित हुआ।
ZSL की ताजा जांच रिपोर्ट बताती है कि पानी में ऑक्सीजन की मात्रा पर्याप्त स्तर पर है और कॉपर एवं जिंक जैसे प्रदूषकों में उल्लेखनीय कमी आई है। ZSL की यूरोपीय संरक्षण परियोजनाओं की प्रबंधक जोआना बार्कर ने कहा कि लोग अक्सर यह सुनकर हैरान हो जाते हैं कि मध्य लंदन में नियमित रूप से समुद्री स्तनधारी दिखाई देते हैं। शिकारी जीवों के रूप में इनकी मौजूदगी इस बात का अच्छा संकेत है कि टेम्स का पानी साफ हो रहा है और नदी अब बड़ी संख्या में मछलियों का घर बन रही है।
लंदन की विशाल टेम्स टाइडवे टनल ने भी नदी को साफ करने में अहम भूमिका निभाई है। 15.5 मील लंबी इस सुरंग को ‘सुपर सीवर’ कहा जाता है। यह फरवरी 2025 में पूरी तरह ऑपरेशनल हो गई है। इसका उद्देश्य लंदन की पुरानी और क्षमता से अधिक दबाव झेल रहे विक्टोरियन सीवेज सिस्टम से टेम्स में जाने वाले करीब 95 प्रतिशत सीवेज रिसाव को रोकना है। जून 2026 तक यह सुरंग 2 करोड़ मीट्रिक टन से ज्यादा सीवेज को नदी में जाने से रोक चुकी है। टेम्स की स्थिति में बड़ा सुधार हुआ है, लेकिन अब भी काफी काम बाकी है। रिपोर्ट के मुताबिक, नदी में नाइट्रे प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है, मछलियों की कुछ प्रजातियों की संख्या अब भी चिंता का विषय है और नदी का पानी लगातार गर्म हो रहा है। ZSL के अध्ययन के अनुसार, 2007 से 2024 के बीच गर्मियों के दौरान टेम्स के पानी का तापमान औसतन हर साल 0.13 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है।
कभी जिस नदी को वैज्ञानिकों ने ‘जैविक रूप से मृत’ घोषित कर दिया था, आज वो फिर से शार्क, सील और दूसरी जलीय प्रजातियों का घर बन चुकी है। इससे यह पता चलता है कि सही दिशा में और लगातार किये गए प्रयास दम तोड़ती नदियों को पुन:जीवित कर सकते हैं। यदि अपने देश में भी इसी इच्छाशक्ति के साथ काम किया जाए, तो मां समझी जाने वालीं नदियों को बचाना संभव है।