
UN Security Council Reform: UN प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि सुरक्षा परिषद (Security Council) का काम न कर पाना या बेअसर होना, जो कि पुरानी और अप्रासंगिक सोच में फंसी हुई है, चिंता का विषय है और इसमें सुधार करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि गंभीर संकटों के समय परिषद के बेअसर होने का एक कारण इसका पुराना ढांचा है।
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुटेरेस ने कहा कि गंभीर संकटों के समय परिषद के बेअसर होने का एक बड़ा कारण इसका पुराना ढांचा है। उन्होंने कहा, ऐसी सुरक्षा परिषद का होना स्वीकार्य नहीं है जिसका गठन आज की दुनिया के बजाय कई दशक पहले की दुनिया को दर्शाता हो, और यही इसके बेअसर होने का एक कारण है।
संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी निर्णय लेने वाली संस्था सुरक्षा परिषद 1945 में बनाई गई थी, जिसमें द्वितीय विश्व युद्ध के विजेताओं को वीटो पावर के साथ स्थायी सीटें दी गई थीं। तब से दुनिया बहुत बदल चुकी है- युद्ध के बाद आजादी की लहरों के साथ 'ग्लोबल साउथ' का उदय हुआ है और अब संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता में उसका दबदबा है। भारत समेत एशिया और यूरोप के कई देश आर्थिक और राजनीतिक रूप से कुछ स्थायी सदस्यों से कहीं आगे हैं, फिर भी उन्हें सुरक्षा परिषद की सत्ता के समीकरण से बाहर रखा गया है।
सुधार को प्राथमिकता देने पर जोर देते हुए गुटेरेस ने कहा कि स्थायी सदस्यों के व्यवहार ने "बिना सजा के काम करने का माहौल" (impunity) बना दिया है, जिससे अन्य देश अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानने से इनकार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि "भू-राजनीतिक मतभेदों" ने सुरक्षा परिषद को बेअसर कर दिया है, और जो ताकतें खुद अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती हैं, वे ही परिषद में बैठी हैं, जबकि उसका काम दुनिया में शांति और सुरक्षा बनाए रखना है।
उन्होंने कहा, "सबसे बड़ी ताकतों से जो उदाहरण मिल रहा है, वह अच्छा नहीं है और दुनिया भर के हर देश को लगता है कि उन्हें जो मन करे, वह करने का हक है।" उन्होंने आगाह किया कि सजा न मिलने की इसी छूट ने ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें ज़्यादा से ज़्यादा देश अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवीय कानून और मानवाधिकार कानूनों का उल्लंघन बिना डर के कर रहे हैं।
सुरक्षा परिषद के विस्तार के साथ-साथ वीटो पावर में सुधार की भी मांग उठती रही है, ताकि स्थायी सदस्यों को उन मुद्दों पर वीटो इस्तेमाल करने से रोका जा सके जिनसे वे खुद जुड़े हों, या जब मानवता के खिलाफ अपराध या मानवीय संकट जैसे गंभीर मामले सामने हों।