Sindhi Rights: यूएनएचआरसी में कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान में सिंधियों की बिगड़ते हालात पर चिंता जताई। वहीं भारत की समावेशी नीतियों की तारीफ की।
Sindhi Rights : जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC 2025) के 60वें सत्र में मानवाधिकार कार्यकर्ता दिव्या आडवाणी ने पाकिस्तान में सिंधियों की बिगड़ती स्थिति (Sindhi Rights) पर चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान में सिंधी आबादी तेजी से घट रही (Pakistan Minority Issues) है, जबकि भारत में यह समुदाय समृद्धि और समान अधिकारों का आनंद ले रहा है। आडवाणी ने कहा कि पाकिस्तान में सिंधियों की स्थिति चिंताजनक है, और मीडिया में दिखाई देने वाली खबरें इसे और स्पष्ट करती हैं। आडवाणी ने भारत के संवैधानिक ढांचे की तारीफ की, जो अल्पसंख्यकों और दलितों को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में समान अधिकार (India Inclusive Policies) देता है। भारत में सिक्ख, मुस्लिम और अन्य समुदायों को संरक्षण और अवसर प्राप्त हैं, जिससे उनकी प्रगति सुनिश्चित होती है। यह नीति भारत को अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए एक मिसाल बनाती है।
पाकिस्तान में सिंध और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में जबरन गायब होने और उत्पीड़न की घटनाएं लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं। मानवाधिकार संगठन सरकारी एजेंसियों पर राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए धमकी और अपहरण का आरोप लगाते हैं। इससे सिंधी समुदाय के परिवारों में भय और पीड़ा बढ़ रही है।
सिंधी अधिकार मंच के संस्थापक गोविंद गुरबानी ने भारत की नीतियों को सराहा। उन्होंने बताया कि भारत में मुस्लिम, दलित और अन्य अल्पसंख्यकों को बिना भेदभाव के समान अधिकार मिलते हैं। दलितों को नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण, जबकि मुस्लिम नेताओं ने देश में शीर्ष पदों पर काम किया है। गुरबानी ने कहा कि भारत का लोकतंत्र सभी समुदायों को एकसमान अवसर देता है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से यूएनएचआरसी में पाकिस्तान में सिंधियों की खराब स्थिति को उजागर करना एक महत्वपूर्ण कदम है। यह भारत की समावेशी नीतियों की तारीफ और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की आलोचना को दर्शाता है। सिख समुदाय और अन्य अल्पसंख्यकों ने इस चर्चा का स्वागत किया है, क्योंकि यह वैश्विक मंच पर उनकी आवाज को मजबूती देता है।
इस कार्यक्रम के बाद, सिंधी अधिकार मंच और अन्य मानवाधिकार संगठन पाकिस्तान में सिंधियों और अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर और ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। यूएनएचआरसी के अगले सत्रों में इस मुद्दे पर और विस्तृत चर्चा या प्रस्ताव की उम्मीद है। साथ ही, भारत की नीतियों को और प्रचारित करने की योजना बन सकती है।
यह मुद्दा न केवल सिंधियों के अधिकारों तक सीमित है, बल्कि यह भारत-पाकिस्तान के बीच अल्पसंख्यक नीतियों की तुलना को भी उजागर करता है। भारत में संवैधानिक ढांचा अल्पसंख्यकों को समान अवसर देता है, जबकि पाकिस्तान में जबरन गायब होने और उत्पीड़न की खबरें चिंता का विषय हैं। यह चर्चा दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत भी प्रभावित कर सकती है।
इधर गुरबानी ने बताया कि यूएनएचआरसी में कई देश भारत की आलोचना करते हैं, लेकिन भारत की समावेशी नीतियों को उजागर करना जरूरी है। उन्होंने पाकिस्तान की संसद में सिंधी सांसदों के बयानों का हवाला दिया, जहां वे अपने समुदाय की सुरक्षा के लिए मदद मांग रहे हैं। यह कार्यक्रम भारत की नीतियों को वैश्विक स्तर पर प्रचारित करने का एक प्रयास है। एएनआई