
China-America Relations : अमेरिका और चीन में तनातनी जग जाहिर है, लेकिन इसे कम करने के नाम पर डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे और उनके तमाम दावों व वादों के बावजूद इन दोनों ताकतवर देशों के रिश्तों में मधुरता नहीं आई है। अमरीका ने 80 कंपनियों और उनकी सहायक कंपनियों प्रतिबंध लगाए तो चीन ने भी अमेरिका की 10 कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिए। वाशिंगटन की ओर से चीनी कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने के जवाब में चीन ने रक्षा और दुर्लभ पृथ्वी खनन में शामिल अमेरिकी कंपनियों पर निर्यात नियंत्रण लागू कर दिया है। बहरहाल दोनों देशों को एक दूसरे की बढ़ती ताकत से खतरा महसूस हुआ और एक दूसरे से आगे रहने की होड़ में पहले शक गहराया और बाद में एक दूसरे की कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने का सिलसिला शुरू हुआ। दुनिया के दोनों ताकतवर देशों में यह तनातनी परस्पर मधुर संबंधों के लिए अच्छी नहीं है।
अमरीका का आरोप है कि ये लोग और कंपनियां ईरान को हथियार बनाने और शाहेद ड्रोन व बैलिस्टिक मिसाइल के लिए जरूरी सामान जुटाने में मदद कर रहे थे। ध्यान रहे कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस महीने कह चुके हैं कि ताइवान को प्रस्तावित 14 अरब अमेरिकी डॉलर के हथियार पैकेज की समीक्षा की जा रही है।
चीन का यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से बीजिंग की यात्रा के एक महीने बाद आया है, जहां उन्होंने अपने चीनी समकक्ष शी जिनपिंग के साथ वार्ता के दौरान तनावपूर्ण रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश की थी। अमरीकी वित्त मंत्रालय का कहना था कि ईरान की सैन्य क्षमता रोकने के लिए आर्थिक कार्रवाई जारी रहेगी। साथ ही, ईरान के साथ गैर कानूनी व्यापार करने वाली विदेशी कंपनियों और बैंकों पर भी कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई। अमेरिका ने यह कदम खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की समुद्री गतिविधियों को सीमित करने के लिए उठाया है। ईरान बड़े पैमाने पर ड्रोन बनाने की क्षमता रखता है और हर महीने करीब 10 हजार ड्रोन बना सकता है।
उधर चीन के वाणिज्य मंत्रालय का कहना है कि नए निर्यात नियंत्रण 'अमेरिकी सरकार की ओरसे अपनी तथाकथित 'चीनी सैन्य उद्यम सूची' में और भी देशों को जोड़ने की नफरती करतूत के जवाब में' अमेरिका के खिलाफ ये प्रतिबंध लागू किए गए हैं।अहम बात यह है कि दोनों देशों ने टैरिफ कम करने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई थी, लेकिन तब से दोनों पक्षों के बीच तकनीकी और रक्षा क्षेत्रों में एक-दूसरे को पछाड़ने के की नीयत के कारण ये रिश्ते तनावपूर्ण हो गए हैं।
दरअसल समस्या वहां से शुरू हुई जब वाशिंगटन ने इस महीने 80 कंपनियों और उनकी सहायक कंपनियों की एक नई ब्लैकलिस्ट जारी की है , जिनके बारे में उसका कहना है कि वे चीनी सेना की मदद कर रही थीं। इसके नतीजे में प्रौद्योगिकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां अलीबाबा और बायडू के साथ-साथ इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी बीवाईडी भी शामिल हो गईं, जिससे बीजिंग ने जवाबी कार्रवाई की धमकी दी।
चीन की सूची में अमेरिका की इन 10 संस्थाओं में एवेक्स शामिल है, जिसके पास अमेरिकी सेना के साथ एयरोस्पेस रक्षा अनुबंध हैं, और ओशकोश डिफेंस, जो सैन्य वाहन बेड़े का उत्पादन करती है। इसमें अमेरिकी दुर्लभ पृथ्वी उत्पादकों एमपी मटेरियल्स और यूएसए रेयर अर्थ के नाम भी शामिल हैं।
चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि निर्यातकों को सूचीबद्ध संस्थाओं को दोहरे उपयोग वाली वस्तुएं उपलब्ध कराने से प्रतिबंधित किया गया है, और साथ ही यह भी कहा है कि "वर्तमान में चल रही सभी संबंधित निर्यात गतिविधियों को तत्काल बंद कर देना चाहिए। यह प्रतिबंध किसी भी देश या क्षेत्र में स्थित संगठनों या व्यक्तियों पर भी लागू होता है, जो चीन से उत्पन्न दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं को उक्त संस्थाओं को हस्तांतरित या प्रदान करते हैं।
चीन के वित्त मंत्रालय ने साथ ही साथ सार्वजनिक खरीद में शामिल एजेंसियों पर लॉकहीड मार्टिन, रेथियॉन और बोइंग के रक्षा प्रभाग सहित 46 अमेरिकी फर्मों द्वारा निर्मित उत्पादों को खरीदने पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। इस सूची में जनरल डायनेमिक्स और एंडुरिल इंडस्ट्रीज के विभाग भी शामिल थे, जो प्रमुख अमेरिकी सैन्य ठेकेदार हैं, और कई एयरोस्पेस कंपनियां भी शामिल थीं।
चीन के वित्त मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, चीन में कार्यरत अमेरिकी निवेश वाली कंपनियों को इस दायरे से बाहर रखा गया है, और मंत्रालय ने कहा कि ये उपाय सोमवार से प्रभावी होंगे। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री के सिलसिले में 2024 और 2025 दोनों में ही इनमें से कई फर्मों और उनकी सहायक कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिए थे।