यह 1979 में ईरान में इस्लामी गणराज्य स्थापना के बाद अमेरिका-ईरान के बीच सबसे उच्चस्तरीय बातचीत थी, जो अंततः विफल हो गई। यह मात्र एक वार्ता की असफलता नहीं, बल्कि संकट से निकलने की उम्मीद पर गहरी चोट है।
1979 में ईरान में इस्लामी गणराज्य बनने के बाद यह अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़े स्तर की बातचीत थी। आखिरकार यह विफल हुई।
यह सिर्फ एक वार्ता की विफलता नहीं है। यह उस उम्मीद पर करारी चोट है जो इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता दिखा रही थी।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस दो हफ्ते के सीजफायर के बाद जल्दी से कोई ठोस समझौता चाहते थे। लेकिन ईरान की कूटनीतिक शैली बिल्कुल अलग है। तेहरान हमेशा लंबे समय तक, धीरे-धीरे बातचीत करता है।
कमरे के अंदर जो कहा गया उससे परे तकनीकी कागजात बार-बार साझा किए गए और जांचे गए। लेकिन दोनों पक्ष सिर्फ मुद्दों में नहीं बल्कि अपने स्वभाव और तरीके में भी बहुत दूर थे।
ईरान का कहना है कि बातचीत अमेरिका की अत्यधिक मांगों की वजह से विफल हुई। और दोनों तरफ से यह साफ है कि परमाणु संवर्धन यानी यूरेनियम एनरिचमेंट सबसे बड़ा अड़ंगा रहा।
ईरान सालों से कहता आया है कि वो परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और उसका कार्यक्रम सिर्फ बिजली उत्पादन के लिए है। लेकिन हाल के सालों में यूरेनियम संवर्धन का स्तर इतना बढ़ा दिया गया कि पश्चिमी देश बेचैन हो गए।
यही बेचैनी पिछले साल इजराइल के साथ 12 दिन की जंग की वजह भी बनी थी। अमेरिका चाहता है पक्का और स्थायी वादा। ईरान संवर्धन छोड़ने को तैयार नहीं।
बातचीत के दौरान ईरानी मीडिया से कई ऐसे बयान आए जो साफ तौर पर घर की जनता को संबोधित थे। ईरान के विदेश मंत्रालय ने तो यहां तक कह दिया कि कूटनीति ईरानी धरती के रक्षकों के पवित्र संघर्ष की ही एक कड़ी है।
यानी अपने ही दुश्मन से बात करने को उन्हें अपनी जनता के सामने जिहाद का हिस्सा बताना पड़ा। यह बताता है कि ईरान के नेताओं के लिए अंदरूनी दबाव कितना बड़ा है।
पहला सवाल यह है कि क्या ट्रंप की वो धमकी फिर से सामने आएगी जिसमें उन्होंने ईरान की पूरी सभ्यता को मिटाने और बिजली संयंत्रों को तबाह करने की बात कही थी। सीजफायर उसी धमकी की पृष्ठभूमि में हुआ था।
दूसरा सवाल यह है कि अमेरिका के खाली हाथ लौटने पर ईरान का अगला कदम क्या होगा। और तीसरा सवाल जो दुनिया की अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। होर्मुज की अनिश्चितता, तेल की कीमतें और वैश्विक बाजार कब तक इस लटकती तलवार के नीचे बैठे रहेंगे।
इस बीच, वेंस ने कहा है कि गेंद ईरान के पाले में है। लेकिन अगर ईरान ने इस आखिरी प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया तो आगे क्या होगा, यह सोचकर दुनिया सहम जाती है।