Middle East energy crisis: अमेरिका और इजरायल ने ईरान के दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड South Pars पर हमला किया। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में जवाबी हमला किया, कतर में ईरानी दूतावास के कर्मचारियों को देश छोड़ने का आदेश दिया गया, और तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं।
Iran South Pars gas field: पश्चिम एशिया में बुधवार को तनाव अचानक चरम पर पहुंच गया, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान में स्थित दुनिया के सबसे बड़े गैस भंडार साउथ पार्स गैस फील्ड (South Pars Gas Field) पर सैन्य हमला किया। यह गैस फील्ड वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की रीढ़ माना जाता है, इसलिए इस पर हमले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है।
हमले के बाद ईरान ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए खाड़ी क्षेत्र के कई तेल और गैस प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। खासतौर पर कतर के रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी (Ras Laffan Industrial City) में स्थित प्रमुख गैस सुविधाओं पर हमला किया गया, जिससे भारी नुकसान की खबर सामने आई है। कतर की सरकारी ऊर्जा कंपनी कतर एनर्जी (Qatar Energy) ने आधिकारिक बयान में इस हमले की पुष्टि की है। साथ ही, सऊदी अरब ने दावा किया है कि उसने अपने ऊपर हुए ईरानी हमलों को सफलतापूर्वक विफल कर दिया है।
बढ़ते तनाव के बीच कतर ने सख्त रुख अपनाते हुए अपने देश में मौजूद (Embassy of Iran in Qatar) के कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों को 24 घंटे के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया है। उन्हें “पर्सोना नॉन ग्राटा” घोषित कर दिया गया है। कतर का कहना है कि ईरान ने उसके क्षेत्र पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जो क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। पहले से ही अस्थिर सप्लाई चेन के बीच इस हमले ने संकट को और गहरा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव लंबे समय तक जारी रहा, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। ऊर्जा संकट गहराने के साथ-साथ महंगाई और सप्लाई बाधित होने की आशंका भी बढ़ गई है।
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता यह टकराव अब क्षेत्रीय संघर्ष से आगे बढ़कर वैश्विक संकट का रूप ले सकता है। खाड़ी क्षेत्र, जो दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र है, वहां किसी भी प्रकार की अस्थिरता पूरे विश्व को प्रभावित करती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस बढ़ते संघर्ष को रोक पाएंगे या स्थिति और बिगड़ेगी।