
Israel US Relations: अमेरिका में मध्यावधि चुनाव के नतीजों ने इजरायल के साथ उसके रिश्तों को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। वाशिंगटन में सत्ता का संतुलन बदलने के साथ अब सवाल उठ रहा है कि क्या तेल अवीव को मिलने वाली अमेरिकी सैन्य मदद और कूटनीतिक समर्थन पहले की तरह कायम रह पाएगा। ईरान के खिलाफ युद्ध, गाजा में तबाही और महंगाई से परेशान मतदाताओं ने अमेरिकी राजनीति को ऐसा संदेश दिया है, जिसे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू नजरअंदाज नहीं कर सकते।
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की दोनों सदनों में जीत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास तौर पर इजरायल के साथ अमेरिका के रिश्तों को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। चुनावी नतीजों के बाद रिपब्लिकन खेमे में भी इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है कि इजरायल के प्रति मौजूदा नीति पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हुई।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने चुनावी हार के लिए ईरान युद्ध और बढ़ती महंगाई को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि मतदाता अमेरिका की विदेश नीति में बदलाव चाहते हैं। कई लोगों की नाराजगी इस बात से भी जुड़ी है कि युद्ध के कारण ईंधन महंगा हुआ और सरकारी खर्च बढ़ा। अमेरिकी समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (एपी) के सर्वेक्षण में करीब छह में से दस मतदाताओं ने ईरान के खिलाफ युद्ध को गलत फैसला बताया।
मिशिगन में डेमोक्रेट अब्दुल एल-सयद की जीत ने इस बहस को और मजबूत किया है। उन्होंने इजरायल को अमेरिकी सैन्य सहायता बंद करने की मांग की थी। उनकी जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इजरायल समर्थक लॉबी एआईपीएसी ने उन्हें हराने के लिए भारी रकम खर्च की थी।
अमेरिकी राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह नतीजा उन नेताओं के लिए मिसाल बन सकता है जो इजरायल की सैन्य नीति पर सवाल उठाते हैं। हालांकि चुनाव में स्वास्थ्य सेवाओं और महंगाई जैसे मुद्दे भी अहम रहे, लेकिन गाजा और ईरान युद्ध को लेकर नाराजगी ने राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया।
अमेरिका और इजरायल के बीच मौजूदा समझौते के तहत सितंबर 2028 तक सालाना 3.8 अरब डॉलर की सैन्य सहायता निर्धारित है। ट्रंप ने चुनाव के दिन इस सहायता को समाप्त करने की बात कही, लेकिन इसके लिए कोई स्पष्ट योजना सामने नहीं आई। हथियारों की बिक्री जारी रखने की उनकी टिप्पणी ने भी इस घोषणा की वास्तविकता पर सवाल खड़े किए हैं।
डेमोक्रेटिक बहुमत अब संसदीय समितियों के जरिए गाजा में अमेरिकी हथियारों के इस्तेमाल, मानवाधिकारों और सैन्य आपूर्ति की जांच कर सकता है। हालांकि राष्ट्रपति के वीटो अधिकार के कारण किसी बड़े बदलाव को लागू करना आसान नहीं होगा।
जानकारों की मानें तो अमेरिका में इजरायल के प्रति नाराजगी बढ़ रही है, लेकिन दोनों देशों के रिश्ते सिर्फ संसद के फैसलों पर नहीं टिके हैं। सालों से चला आ रहा रक्षा सहयोग, खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान और तकनीकी साझेदारी इनको आपस में मजबूती से जोड़े हुए हैं।
इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड ने भी साफ कहा है कि नेतन्याहू की नीतियों की वजह से अमेरिका में इजरायल को कम समर्थन मिल रहा है। लैपिड की राय है कि इजरायल को अब दोनों अमेरिकी पार्टियों से अपने संबंध दुरुस्त करने की ज़रूरत है।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अब जब नई कांग्रेस सामने है, उनके पास मौका है कि इजरायल को दी जाने वाली मदद और उसकी सैन्य कार्रवाइयों पर निगरानी बढ़ा सकें। फिर भी, अमेरिकी राष्ट्रपति को जो अधिकार मिले हैं और सुरक्षा मामले में दोनों देशों की मिलीभगत इतनी गहरी है कि फौरन किसी बड़े बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल है।