Military Vulnerability: अमेरिका की ओर से अपनी सेना कम करने के संकेतों के बाद यूरोपीय यूनियन की रक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई है। यूरोप की सुरक्षा इतनी कमजोर क्यों है, इसका असली कारण खुद उनके अपने आंतरिक मतभेद हैं।
US Troop Reduction : जब अमेरिका ने यूरोप से अपनी सेना कम करने के संकेत दिए, तो इस एक खबर ने पूरे यूरोपियन आईलैंड की नींद उड़ा कर रख दी। अब दुनिया के सामने सवाल यह उठ रहा है कि इतने सारे विकसित, अमीर और ताकतवर देशों का समूह होने के बावजूद, यूरोपियन यूनियन की रक्षा व्यवस्था अचानक इतनी बदहाल और बेबस क्यों नजर आ रही है? अगर अमेरिका पूरी तरह से अपनी सैन्य सुरक्षा का छाता हटा ले, तो क्या यूरोप अपनी हिफाजत खुद कर पाएगा ? सच्चाई यह है कि यूरोप की इस सैन्य कमजोरी का असली कारण किसी बाहरी दुश्मन में नहीं, बल्कि खुद यूरोप के अंदर ही छिपा हुआ है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह से अमेरिका और नाटो गठबंधन पर निर्भर रहा है। दशकों तक यूरोपियन देशों ने अपनी सेना, हथियारों और रक्षा अनुसंधान पर भारी खर्च करने के बजाय अपने आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया। उन्हें हमेशा यह पक्का भरोसा रहा कि रूस या किसी अन्य देश से खतरा होने पर अमेरिकी सेना उनकी ढाल बन कर खड़ी रहेगी। लेकिन आज, जब अमेरिका अपनी घरेलू राजनीति और 'इंडो-पैसिफिक' क्षेत्र (विशेषकर चीन की चुनौतियों) पर ज्यादा ध्यान दे रहा है, तो यूरोप खुद को एक अनाथ और असहाय स्थिति में पा रहा है।
यूरोपियन यूनियन की सबसे बड़ी कमजोरी उसका अपना अंदरूनी ढांचा और देशों के बीच का मतभेद है। ईयू में 27 अलग-अलग देश हैं, और सबकी अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताएं, विदेश नीतियां और खतरे को देखने का नजरिया अलग है। जब भी 'एक साझा यूरोपियन सेना' बनाने का प्रस्ताव आता है, तो सदस्य देशों के बीच कभी आम सहमति नहीं बन पाती। इसके अलावा, यूरोप का रक्षा उद्योग बुरी तरह से बंटा हुआ है। हर देश अपनी राष्ट्रीय कंपनियों से अलग-अलग हथियार खरीदता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका जहां कुछ गिने-चुने और अत्याधुनिक लड़ाकू टैंकों और हथियारों का इस्तेमाल करता है, वहीं यूरोप में दर्जनों प्रकार के अलग-अलग टैंक और मिलिट्री सिस्टम मौजूद हैं। युद्ध के मैदान में इन अलग-अलग प्रणालियों को एक साथ इस्तेमाल करना बेहद मुश्किल और खर्चीला साबित होता है। इस बिखराव के कारण यूरोपीय देशों का रक्षा बजट सही जगह इस्तेमाल नहीं हो पाता।
नाटो के नियमों के मुताबिक, हर सदस्य देश को अपनी कुल जीडीपी का कम से कम 2% हिस्सा अपनी रक्षा पर खर्च करना अनिवार्य है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि यूरोप के कई प्रमुख और अमीर देश सालों तक इस लक्ष्य को पूरा करने में नाकाम रहे हैं। हालांकि, रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के बाद जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने घबराकर अपना रक्षा बजट बढ़ाया है, लेकिन दशकों की इस कंजूसी और अनदेखी की भरपाई रातों-रात नहीं की जा सकती। सेना में गोला-बारूद की भारी कमी, पुरानी तकनीक और सैनिकों की घटती संख्या आज यूरोप के लिए एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है।
रूस-यूक्रेन संकट ने यूरोप को यह कड़ा सबक सिखा दिया है कि पारंपरिक युद्ध का खतरा अभी टला नहीं है। अमेरिका का सेना में कटौती करने का इशारा यूरोप के लिए एक ऐतिहासिक 'वेक-अप कॉल' है। अब यूरोपीय यूनियन को यह समझना ही होगा कि वे हमेशा के लिए वाशिंगटन के भरोसे हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते।
बहरहाल,अगर यूरोप को अपनी संप्रभुता और सुरक्षा बचानी है, तो उसे अपनी राजनीतिक नौकरशाही और आपसी मतभेदों को नजरअंदाज करना होगा। रक्षा बजट को सिर्फ बढ़ाना ही काफी नहीं है, बल्कि एक साझा यूरोपियन रक्षा रणनीति के तहत हथियारों के निर्माण और सेना के आधुनिकीकरण पर एक साथ मिल कर काम करना होगा। अगर यूरोप अब भी अपने अंदर की इस खोखली व्यवस्था को सुधारने में नाकाम रहता है, तो आने वाले समय में उसे इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।