
Will Russia Attack NATO Nations: पश्चिम एशिया में जारी तनाव और रूस-यूक्रेन जंग के बीच अमेरिका से आई खुफिया रिपोर्ट ने NATO देशों को चिंता में डाल दिया है। दरअसल, इस रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन उकसावे वाले कदमों को मंजूरी देने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक तैयार हो सकते हैं। इसके लिए वे अगले कुछ वर्षों में NATO की दृढ़ता को परखने के लिए किसी सहयोगी देश पर सीमित हमला करने की कोशिश कर सकते हैं। रूस यह आकलन कर सकता है कि यदि NATO के किसी सहयोगी देश पर हमला होता है तो डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन किस तरह प्रतिक्रिया देगा।
अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक, इन कार्रवाइयों में हाइब्रिड ऑपरेशन, साइबर हमले और ऐसे अन्य कदम शामिल हो सकते हैं, जिनसे रूस सीधे तौर पर अपनी भूमिका से इनकार कर सके। हालांकि, ये कदम पूर्ण पैमाने पर पारंपरिक सैन्य अभियान से नीचे के स्तर के होंगे। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ये आकलन ऐसे समय में सामने आए हैं, जब कुछ महत्वपूर्ण हथियारों और गोला-बारूद की कमी बनी हुई है। इन हथियारों और गोला-बारूद की जरूरत भविष्य में रूस या चीन के साथ संभावित युद्ध की स्थिति में अमेरिकी सेना को पड़ सकती है।
यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति किए जाने के साथ-साथ ईरान के साथ संघर्ष के कारण अमेरिकी हथियार भंडार में काफी कमी आई है। इनमें लंबी दूरी की प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइलें और आर्मी टैक्टिकल मिसाइल सिस्टम के साथ-साथ कम दूरी की स्टिंगर सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें भी शामिल हैं।
अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक, रूस भविष्य में बाल्टिक देशों लातविया, लिथुआनिया और एस्टोनिया या पोलैंड को निशाना बना सकता है। खुफिया रिपोर्टों में आशंका जताई गई है कि रूस सीधे बड़े सैन्य हमले के बजाय साइबर हमलों, उकसावे और सीमित सैन्य घुसपैठ जैसे कदम उठा सकता है। मकसद ऐसा दबाव बनाना हो सकता है, जिससे तनाव तो बढ़े, लेकिन NATO के साथ व्यापक युद्ध की स्थिति तुरंत पैदा न हो। हाल के दिनों में इस तरह की गतिविधियों के संकेत भी मिले हैं।
अमेरिका की इस रिपोर्ट से पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी देशों पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि वे संयुक्त राष्ट्र चार्टर और आत्मनिर्णय के सिद्धांतों का इस्तेमाल अपने हित के अनुसार चुनिंदा तरीके से करते हैं। व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंध अपने मकसद में नाकाम रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि 2022 से पश्चिम ने रूस के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन इनका रूस पर कोई खास असर नहीं पड़ा।