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भूखा मरने के बजाय अपनी धरती पर अपने परिवार के बीच मरना अच्छा है

यूपी के बहराइच जा रहे फैक्ट्री कर्मचारियों का दर्द उभरा पंजाब से सैकड़ों प्रवासियों का पलायन शुरू, पैदल जा रहे

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पलायन

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अमृतसर। कोरोनावायरस के संक्रमण से मौत का डर है। कारखानों में काम करने वाले भूखे-प्यासे दिहाड़ी मजदूरों के सामने रोटी का संकट खड़ा हो गया है। उनके लिए घर में बैठकर कोरोनावायरस से जंग जीतना संभव नहीं है। न ही उनकी जेब में पैसे हैं और न ही खाने के लिए घर में राशन। फिर क्या करें? यहीं पर रहें तो भूख से मरना है। बाहर जाएं तो कोरोनावायरस से। फिर यह सोचा कि अपनी धरती पर सीना तानकर मरना ज्यादा अच्छा है। निकल पड़े हैं परिवार के साथ। अपने घर जाने के लिए। पैदल चले जा रहे हैं। रास्ते में पुलिस के डंडे खाते जा रहे हैं। रोजी रोटी का संकट सिर पर लिये ये सब नंगे पैर, भूखे-प्यासे समूहों में निकल पड़े हैं। इस आस में कि किसी तरह वे अपने घर पहुंच जाएं। पंजाब के एक जिले का नहीं, बल्कि कई जिलों का यही हाल है।

आखिरी वक्त में परिजनों का चेहरा तो देख पाएंगे

अमृतसर से लुधियाना की ओर पैदल निकले मनोज कुमार ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के रहने वाले हैं। यहां मजदूरी करने आए थे। अब पैदल ही लुधियाना की ओर निकल रहे हैं। वहां से कोई साधन मिला तो ठीक नहीं तो पैदल ही बहराइच पहुंचेंगे। उन्होंने कहा अगर मरना ही है तो भूखे मरने के बजाय अपनी धरती पर अपने परिवार के बीच मरना अच्छा है। कम से कम हमारी लाश को कंधा देना वाला तो कोई होगा। मरते वक्त आखिरी बार अपने परिजनों का चेहरा तो देख पाएंगे। इसी तरह बहराइच के रहने वाले कुलदीप ने भी आपबीती सुनाते हुए कहा- जिस तरह की यह बीमारी है उसे देखकर ऐसा नहीं लग रहा कि मई और जून के पहले कोई फैक्ट्री चलेगी। यहां रहकर भूख से नहीं मरना चाहते हैं।

जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं

अमृतसर से बिहार के बेतिया जिले के लिए पैदल निकले दिहाड़ीदार कहते हैं- साहब बहुत भूख लगी है। दिहाड़ीदार हैं। छह दिनों से काम बंद होने के चलते जेब में अब एक फूटी कौड़ी भी नहीं बची है। शायद चार पांच दिनों में अपने परिवार के पास घर पहुंच जाएं। हिम्मत तो अभी से जवाब देने लगी है, पर क्या करें हमारे पास दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है। ऐसे ही लुधियाना से सैकड़ों प्रवासी कोरोनावायरस के डर से पलायन करते जा रहे हैं। साधन नहीं है। मजबूरी में सिर्फ चलना है तो बस पैदल।