
मां नर्मदा उद्गम जल से जालेश्वर धाम महादेव का होगा जलाभिषेक, जयकारें से गुुंजेंगी अमरकंटक नगरी
अनूपपुर। भगवान शिव के साथ मार्कंडेय, भृगु, कपिलमुनि, दुर्वासा, चैवन्य, अरंण्यक जैसे ऋषियों की तपस्य स्थली भूमि रही अमरकंटक नगरी मां नर्मदा के उद्गम स्थल के साथ भगवान शिव के स्वयं-भू प्रकट स्वरूप ज्वालेश्वर(जालेश्वर) के रूप में भी प्रसिद्ध है। अमरकंटक(मप्र) और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित जालेश्वर धाम और मां नर्मदा मंदिर उद्गम स्थल अमरकंटक शिवभक्तों के लिए महाशिवरात्रि व्रत और सावन मास में अधिक महत्व रखता है। यहां भी बाबा बैद्यनाथ धाम के शिव जलाभिषेक की भांति नदी से जल भराव करते हुए चढ़ाने का प्रचलन है। फर्क सिर्फ इतना है कि बाबा बैद्यनाथ के लिए भक्त सुलतानगंज में बहती मां गंगा के जल को कावड़ में भरते हैं और ११० किलोमीटर की दूरी तय कर बाबाधाम में जलाभिषेक करते हैं। जबकि अमरकंटक में भोले के भक्त मां नर्मदा उद्गम स्थल से जल को कावड़ में भरकर ८ किलोमीटर दूर जालेश्वर धाम में स्वयं-भू प्रकट महादेव में जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि सावन मास में सोमवार को नर्मदा में स्नान कर गीले वस्त्र में ही दांये हाथे (किसी भी एक हाथ)से जल पात्र में नर्मदा जल लेकर पैदल जालेश्वर महादेव मंदिर जाकर फूल व बेलपत्र लेकर उनका जलाभिषेक करें तो महादेव अपने भक्त पर प्रसन्न होते हैं, साथ ही अगर भक्त जालेश्वर के उपरांत लोढेश्वर महादेव व कोटेश्वर महादेव का भी दर्शन करें तो उससे उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है। जिसके कारण यहां माहभर कांवडिय़ों व श्रद्धालुओं का मंदिरों में पूजन अर्चन के लिए तांता लगा रहता है। हालंाकि वर्ष २००९ में महंत संत महेन्द्रानंद ने अमरेश्वर मंदिर में विशालकाय शिवलिंग की स्थापना व प्राण प्रतिष्ठा की थी। लेकिन महादेव शिव के स्वयं-भू बनी जालेश्वर मंदिर की महत्ता कम नहीं हुई है। पं. गिरिजा शंकर पांडेय बताते हैं कि पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने जब त्रिपुरों का नाश किया था, जब एक पुर (नगर)जलता हुआ जहां गिरा वह स्थली ज्वालेश्वर(जालेश्वर) के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरों के नाश उपरांत यहां स्वयं भगवान शिव स्वयं-भू स्वरूप में प्रकट हुए थे।
मां नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी सावन मास में हजारो शिवभक्तों की भीड़ दर्शन और जलाभिषेक के लिए जुटेगा। जहां शिव और मां नर्मदा के जयघोष से गुंजायमान हो जाएगा। इसके लिए नर्मदा मंदिर समिति सहित प्रशासन ने तैयारी पूरी कर ली है। नर्मदा मंदिर समिति ने बताया कि सावन के उपलक्ष्य में यहां देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। लेकिन इनमें कर्वधा, राजनंदगांव सहित छत्तीसगढ़ राज्य के अन्य जिलों व मप्र के स्थानीय भक्तों की तादाद अधिक होती है। छत्तीसगढ़ के कर्वधा सहित आसपास के जिलों से आने वाले कावडि़ए नर्मदा स्नान और कुंड से जलभराव कर जालेश्वर में जल चढ़ाएंगे। इसके बाद पुन: अमरकंटक नर्मदा मंदिर पहुंचेंगे, जहां जलभर कर कर्वधा स्थित बूढा महादेव मंदिर के लिए रवाना होंगे।
बॉक्स: धीरे धीरे बदला जालेश्वर का स्वरूप
शिव के स्वयं भू प्रकट के बाद ज्वालेश्वर नाम से प्रसिद्ध स्थली का स्वरूप धीरे धीरे बदला। पहले सामान्य स्वरूप में यह धार्मिक स्थल था, बाद में यहां मंदिर का निर्माण और फिर शिवलिंग की स्थापना हुई। मुख्य मंदिर के साथ आसपास अमरेश्वर सहित अन्य मंदिर भी स्थापित हुए। अमरेश्वर में विशालकाय शिवलिंग स्थापित हुआ, जबकि मुख्य जालेश्वर महादेव धाम मंदिर में आज भी शिवलिंग मंदिर के गर्भगृह के सामान ती-चार फीट नीचे स्थापित है। बोर्डर क्षेत्र के कारण यहां मंदिरों के जीर्णोद्वार के लिए प्रशासकीय स्तर पर विशेष पहल नहीं की गई है।
बॉक्स: स्कंद पुराण में राम और पांडवों के गमन का उल्लेख
पं. गिरिजा शंकर पांडेय बताते है कि स्कंद पुराण के रेखा खंड में पांडवों की तपस्या स्थली के रूप में अमरकंटक का उल्लेख है। जबकि राम काल के रामायण में नकटीदेवी और रामगमण मार्ग का भी उल्लेख मिलता है। अमरकंटक क्षेत्र में ही जालेश्वर के शामिल होने के कारण इन दोनों स्थलों के वनों में आज भी कई संत अज्ञात रूप में तपस्या में लीन है।
------------------------------------------------
Published on:
06 Jul 2020 06:00 am

बड़ी खबरें
View Allअनूपपुर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
