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मौत से बाजी: नदी की तेजधारा से ग्रामीण कर रहे खिलवाड़, जान की बाजी लगाकर कर रहे रपटा पार

मौत से बाजी: नदी की तेजधारा से ग्रामीण कर रहे खिलवाड़, जान की बाजी लगाकर कर रहे रपटा पार

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Survival of death: Rustic villagers from the torch of river, crossing

मौत से बाजी: नदी की तेजधारा से ग्रामीण कर रहे खिलवाड़, जान की बाजी लगाकर कर रहे रपटा पार

नदी की उफान में रपटा हुआ जलमग्न, उफान से अंजान जिला प्रशासन, कागजों में सुरक्षा प्रबंधन
अनूपपुर। पिछले कुछ दिनों से जिले में मानसून की लगातार लगी झड़ी में कोतमा की केवई नदी का जलस्तर एक बार फिर से उफान मार रपटा पर हिलोरे ले रहा है, जहां कोतमा और आमाडांड के बीच बनी लगभग १८० मीटर लम्बी रपटे पर लोग मौत की बाजी लगाकर नदी की तेजधारा से खिलवाड़ कर नदी पार कर रहे हैं। सोमवार की जोरदार बारिश के बाद मंगलवार को नदी की उफान में मानों हिलोरे थोड़ी सी चूक में पांव उखाड़ किसी को बहा ले जाए। लेकिन इसे रोकने वाला मौके पर प्रशासनिक स्तर का न तो कोई अधिकारी है और ना ही आपदा प्रबंधन से जुडी कोई टीम। यह हालात प्रत्येक साल बनती है, जहां कोतमा सहित आसपास के ५० हजार परिवारों के लिए आवाजाही मानूसन सीजन के दौरान मुसीबत बन जाता है। बावजूद रपटा की सुरक्षा व्यवस्था भी नहीं कराई गई है। जबकि प्रत्येक मानसून सत्र के दौरान जिला प्रशासन द्वारा कागजी प्रबंधन तैयारियां कर आदेश जारी कर दिए जाते हैं। लेकिन उन हालातों से निपटने या ऐसे खतरनाक रपटे पर आवाजाही रोकने बाद में प्रशासन खुद ही अंजान हो जाती है। यहां तक आपदा प्रबंधन से जुड़ी कोई भी टीम भी मौजूद नहीं होता है। हालांकि पीएमजीएसवाई द्वारा १८० मीटर लम्बा पुल का निर्माण कराया जा रहा है। लेकिन पिछले दो सालों से पुल का निर्माण अबतक पूर्ण नहीं होने पर अब भी लोग जान की बाजी लगाकर इस खतरनाक रपटे से आवाजाही निरंतर कर रहे हैं। बताया जाता है कि कोतमा व आस-पास के क्षेत्रो को जोडऩे वाली केवई नदी रपटा नगरीय क्षेत्र सहित आमाडांड, खोड्री, राजनगर, जमुड़ी, उरा, मलगा, फुलकोना और आसपास के ५० हजार की आबादी की आवाजाही का एक मात्र रास्ता है। जिसपर पुल निर्माण के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष २००६ में घोषणा की थी। यहीं नहीं स्थानीय लोगों की मांग पर जिला योजना समिति में वर्ष २०१४ में उसे खतरनाक रपटा मानते हुए तत्काल उसके निर्माण का प्रस्ताव भेजा गया था, जहां अब पीएमजीएसवाई अनूपपुर द्वारा १८० मीटर लम्बे पुल निर्माण कार्य कराया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि वर्ष १९८५ के आसपास दर्जनों गांव के लोगों को केवई नदी पार कराने के उददेश्य से पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा लगभग १५० मीटर लम्बी रपटा का निर्माण कराया गया था। लेकिन दिनोंदिन नदी के पेट (तलहटी) के भराव के बाद यह रपटा नदी तलहटी से सटता चला गया। जिसके कारण मानसून की चंद बारिश की बौछार में यह रपटा पानी से भर जाता है।
केवई नदी रपटा अब जर्जर होने लगा है। रपटे के बीच वाले हिस्से में दरार के साथ गड्ढे भी बन चुके हैं। सुरक्षा के लिए रेलिंग नहंी होने के कारण थोड़ी सी चूक में उफान के दौरान लोगों को सुरक्षित भी नहीं बचाया जा सका है। अबतक के आंकड़ों में आधा दर्जन लोग असामायिक मौत का शिकार बने हैं। इनमें वर्ष २०१० में ही तीन लोग दरिया में बह गए। इनमें २४ जुलाई २०१० को मंजू केवट पुरानी बस्ती बुढ़ार, ३० जुलाई नितेश उर्फ निन्नी टांडिया पुलिस कॉलोनी कोतमा, ७ नवम्बर ७ वर्षीय खेल्लु अहिरवार की मौत हो गई। जबकि अगस्त २०१३ में शिक्षक लक्ष्मण तिवारी बह गए। वर्ष २०१४ में वाहन सहित फिरदौस की मौत की बहकर हो गई, जिसका शव आजतक उनके परिजनों को नहीं मिल सका। इसके अलावा अन्य मौतें भी शामिल हैं।
बॉक्स: कागजों तक निर्देश
आपदा प्रबंधन समिति की बैठक में जिला प्रशासन ने कोतमा सहित पुष्पराजगढ़ और अनूपपुर के लिए प्रशासनिक अधिकारियों व आपदा प्रबंधन की टीम को सुरक्षा के इंतजाम तथा कोतमा के केवई के लिए प्रशासनिक अधिकारी को मॉनीटरिंग करने के निर्देश दिए थे। जबकि रपटा पर उफान के दौरान बेरिकेट लगाकर आवाजाही पर रोक के निर्देश दिए थे। लेकिन वर्तमान में न तो अधिकारी और ना ही आपदा प्रबंधन टीम ही मौजूद है।
वर्सन:
जैसे ही सूचना मिली थी होमगार्ड के जवानों व पटवारी से लोगों की आवाजाही रोकने के निर्देश दिए थे। अगर रपटा पर लोग आवाजाही कर रहे हैं तो मैं तत्काल उसे पटवारी से कह रोकवाता हूं।
मिलिंद नागदेवे, एसडीएम कोतमा।