
अनूपपुर. पवित्र नगरी अमरकंटक में 35 वर्षों से प्रशिक्षण सह उत्पादन केंद्र बंद पड़ा है। अमरकंटक के बाराती में इसका भवन आज भी जर्जर हालत में है। भवन कभी भी धरासायी हो सकता है। स्थानीय लोगों ने इसे फिर से शुरू कराने की मांग की है, ताकि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकें। कुटीर एवं ग्रामोद्योग राज्य मंत्री दिलीप जायसवाल ने इस दिशा में प्रयास करने की बात कही है। जानकारी के अनुसार वर्ष 1960 में प्रशिक्षण सह उत्पादन केंद्र का संचालन शुरू हुआ था जो वर्ष 1990 तक संचालित रहा। इसके पश्चात इस केंद्र को बंद कर दिया गया जिसके कारण आज अमरकंटक के लोगों को रोजगार के लिए पलायन करना पड़ रहा है। पूर्व में प्रशिक्षण सह उत्पादन केंद्र में जूट, बांस तथा मोवाघास से बनी हुई सामग्री का उत्पादन करते हुए इसका विक्रय किया जाता था। जिससे स्थानीय लोगों को इस केंद्र में रोजगार भी मिलता था। इसी तरह हिंडालको बॉक्साइट परियोजना संचालित होने के कारण स्थानीय मजदूरों को रोजगार मिल जाता था। दोनों ही रोजगार के महत्वपूर्ण केंद्र अमरकंटक में बंद हो चुके हैं। वर्तमान में यहांं रोजगार के लिए कोई भी साधन उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण लोगों को मजदूरी तथा रोजगार के लिए महानगरों की ओर पलायन करना पड़ रहा है।
वर्ष 1960 से 1990 तक चला उत्पादन
स्थानीय परमानंद पड़वार ने बताया कि 1960 से लेकर 1990 तक जनजातीय विभाग द्वारा प्रशिक्षण सह उत्पादन केंद्र के माध्यम से बहुत लोगों को रोजगार दिया गया था। किसानों द्वारा अभी मोवा घास की खेती नहीं की जाती और ना ही पटसन उपलब्ध है। एक तरह का पौधा है इसके रेशे बोरे, दरी, तम्बू, तिरपाल, टाट, रस्सियाँ, निम्नकोटि के कपड़े तथा कागज बनाने के काम आते हंै। कच्चे माल की कमी के कारण यह उपक्रम बंद कर दिया गया। हालांकि शुरुआती दौर में इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय द्वारा टीसीपीसी की मरम्मत कर छात्रों के रहने योग्य बनाया गया था। लालपुर में यूनिवर्सिटी निर्माण के बाद यहां कोई नहीं रहता। यह पूर्ण रूप से जर्जर है।
रोजगार के लिए आज लोग हो रहे परेशान
लामू सिंह धुर्वे निवासी बाराती अमरकंटक ने बताया कि पहले यहां बहुत से व्यवसाय योग्य वस्तुओं का निर्माण किया जाता था जैसे तगदी से बना गलीचा, मोवा की रस्सी, टाट पट्टी, झाड़ू, सरई पत्ते का दोना पत्तल, बांस की टोपी, टोकनी, सूपा, चटाई आदि। बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार प्राप्त था पर इसके बंद होने के बाद बहुत लोग बेरोजगार होकर पलायन कर गए। उसके बाद से टीसीपीसी आज खंडर हो चुका है।
बांस व जूट से बनी कई सामग्रियों का होता था उत्पादन
प्रशिक्षण सह उत्पादन केंद्र टीसीपीसी में जूट, मोवाघास, बांस से बनी सामग्री से टाटपट्टी, गलीचा, मोवा की रस्सी, झाड़ू, सरई पत्ते का दोना पत्तल, बांस की टोपी, टोकनी सूपा, चटाई सहित लोहे व लकड़ी की पेटी, कुर्सी, टेबल, संदूक, आलमारी का निर्माण किया जाता था जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलता था। जूट तत्कालीन समय में कोलकाता से आता था धीरे-धीरे उसका आना बंद हो गया इसके साथ ही मोवाघास की खेती स्थानीय किसानों ने बंद कर दी। कच्चा माल न मिलने की वजह से यह उद्योग धीरे-धीरे बंद होता गया।
इस संबंध में चर्चा करते हुए इसे पुन: प्रारंभ किए जाने के प्रयास किए जाएंगे। दिलीप जायसवाल, कुटीर एवं ग्रामोद्योग राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
Published on:
12 Sept 2024 12:23 pm

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