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Video Story- बचपन में जागा बैराग तो घर त्याग निकल पड़े गुरु की खोज में, गुरु ने दीक्षा देकर समाज सेवा की सौंपी जिम्मेदारी

उच्च शिक्षा के बाद भी मन में धर्म और समाज सेवा की ललक, ले लिया बैराग

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Video Story- When the Bairag woke up in his childhood, he left home an

Video Story- बचपन में जागा बैराग तो घर त्याग निकल पड़े गुरु की खोज में, गुरु ने दीक्षा देकर समाज सेवा की सौंपी जिम्मेदारी

अनूपपुर। अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को गुरू कहा जाता है। वह अज्ञान का ज्ञानांजन से निवारण कर देता है। मान्यता है कि आदिगुरु परमेश्वर शिव दक्षिणामूर्ति रूप में सभी ऋषि मुनि को शिष्य के रूप शिवज्ञान प्रदान किया था। उनके स्मरण को रखते हुए गुरु पूर्णिमा मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा उन सभी आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुजनों को समर्पित परम्परा है जिन्होंने कर्म योग आधारित व्यक्तित्व विकास और प्रबुद्ध करन बहुत कम अथवा बिना किसी मौद्रिक खर्चे के अपनी बुद्धिमता को साझा करने के लिए तैयार हों। कहते हैं गुरू के ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती और बिना ज्ञान व्यक्ति सफल नहीं हो सकता। ऐसे ही अमरकंटक में निवास करने वाले लगभग ८० वर्षीय तपस्वी बाबा कल्याण दास जी महाराज भी है। मूलत: अल्मोड़ा जिला उत्तराखंड से ताल्लुक रखने वाले बाबा तपस्वी जब बाल्यावस्था में थे, जब उनके मन में बैराग जीवन की भावना जागी। मात्र ७ साल की उम्र में ही घर-द्वार छोडक़र गुरू की खोज में चल पड़े। जहां इनकी मुलाकात ब्रह्मलीन बाबा स्वरूप दास जी महाराज से हुई। बाबा स्वरूप दास जी के साथ कुछ समय व्यतीत करने के बाद गुरू ने शिष्य के रूप में इन्हें दीक्षा प्रदान की। यहां दीक्षा के दौरान गुरू ने कल्याण दास जी से बोला कि आप भक्ति मार्ग को अपनाते हुए तपस्या कीजिए और समाज सेवा में अपना जीवन समर्पित कीजिए। इसके बाद बाबा कल्याण दास ने गुरू से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए भ्रमण पर निकल पड़े। कई स्थानों पर तपस्या करते हुए क्षेत्र का भ्रमण किया और समाज के लोगों में धर्म प्रचार प्रसार किया। लगभग ३१ वर्ष की आयु में १९७४ में वे अमरकंटक पहुंचे। यहां नर्मदा किनारे कई वर्षो तक तपस्या की। नर्मदा तट स्थित साल पेड़ के नीचे भभूति लगाकर तपस्या करते थे। तपस्या कई वर्षा तक चली जिसमें सिर्फ एक कंबल लपेटते थे। बाद में उसी स्थान पर भक्तों ने कुटिया का निर्माण किया। फिर कालांतर में कल्याण आश्रम का निर्माण आरंभ हुआ। इसी आश्रम में १९८४ में मंदिर में मूर्तियों की स्थापना हुई। नर्मदा के साथ अधिक लगाव होने के कारण वे नर्मदा की सेवा में जुट गए। हालंाकि उस दौरान नर्मदा के दोनों छोर काफी विस्तारित, लम्बी घासयुक्त और दलदली हुआ करती थी। नर्मदा सेवा और संरक्षण कार्य में जुट गए। दशकों से नर्मदा सेवा के रूप में सफाई और लोगों में नर्मदा की धार्मिक महत्ता की जानकारी दी। हाल के दिनों में नर्मदा की जलधारा में पुष्कर डैम के बीच ५१ फीट उंची प्रतिमा स्थापित की गई है। उनका मानना है कि इस प्रतिमा के दर्शन से भक्तों में साक्षात नर्मदा मैया के दर्शन महसूस होंगे। आज इनके हजारों की संख्या में शिष्य है, जो प्रति गुरू पूर्णिमा के मौके पर आश्रम पहुंचकर उनका चरण वंदन और आशीष प्राप्त करते हैं।
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उच्च शिक्षा के बाद भी मन में धर्म और समाज सेवा की ललक, ले लिया बैराग
सतना जिले से शरीर सम्बंध रखने वाले बाबा लवलीन महाराज, परमहंस आश्रम धारकुंडी शाखा अमरकंटक बताते हैं उच्च शिक्षा (स्नातक) प्राप्ति के बाद भी उनका मन पारिवारिक जीवन में नहीं लगा। पढ़ाई के उपरांत मन में बैराग जागा। जिसके बाद वह घर छोडक़र चित्रकूट स्थित परमहंस आश्रम धारकुंडी आश्रम पहुंचे। यहां गुरू वर्तमान उम्र १०० वर्ष स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज से मिले। यहां स्वामी को अपने मन के अंदर उठ रहे विचारों से अवगत कराया। लेकिन गुरू ने सिर्फ दो शब्द बोले- कुछ दिन आश्रम में सेवा करों। इसके बाद गुरू ने कोई जवाब नहीं दिया। शुरूआत में असमंजस्यता की स्थिति महसूस हुई, कि गुरू का ज्ञान मिल पाएगा या नहीं। लेकिन एक दिन गुरू ने सेवा करने के बाद दीक्षा प्रदान की। दीक्षा प्राप्त करने के बाद भगवा वस्त्र धारण किया। बताया जाता है कि आश्रम में सेवा के दौरान गुरू ने उनके कर्म, बैराग के प्रति आस्था को देखते देखा, और फिर दीक्षा उपरांत अमरकंटक आश्रम के सेवा की जिम्मेदारी सौंपी। बाबा लवलीन महाराज वर्ष २०१७ में अमरकंटक पहुंचे। तब से अब तक आश्रम की सेवा कर रहे हैं। यहां संत सेवा के साथ विद्यार्थियों का नि:शुल्क शिक्षा और सामाजिक कार्यो में सहयोग प्रदान कर रहे हैं।
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