
तेरा सो तेरा मेरा भी तेरा की प्रवृत्ति को जीवन में लाना है, हम संत नही बन सकते तो दंगल वाले कभी न बने: आर्यिका आदर्शमति
अशोकनगर. दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं पहले जो अपनी सम्पत्ति के साथ दूसरो की सम्पदा को भी हड़प लेना चाहते इसलिए उन्हें चाहे दंगल ही क्यों न करना पड़े ये मेरा सो मेरा तेरा भी मेरा वाले लोग होते हैं। दूसरे वे लोग जो अपनी सम्पत्ति में ही सन्तुष्ट रहकर कार्य करते रहते हैं वे मेरा सो मेरा तेरा सो तेरा वाले श्रावक कहलाते हैं। उक्त उदगार आर्यिकाश्री आदर्शमति माताजी ने सुभाषगंज मंदिर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने बताया कि इस दुनिया में तीसरे संत प्रवृति के लोग होते हैं जिन्हें तेरा सो तेरा मेरा भी तेरा के स्वभाव को धारण कर सन्तुष्ट से आगे बढ़ कर निरन्तर जगत की भलाई में लगे रहते हैं ये सज्जन पुरुष इस धरती के संत साधु कहलाते हैं। उन्होंने कहा कि हम संत नहीं बन सकते तो दंगल वाले कभी न बने। कम से कम श्रावक मेरा तो मेरा है तेरा तो तेरा है ऐसे सरल परिणामि बनकर तीसरे क्रम रहने वाले संत जनों का सत्संग कर अपने जीवन को सफल बनाएं।
ऊंचाइयों को पाने के बाद अच्छा सोचें
आर्यिकाश्री दुर्लभमति माताजी ने कहा कि ऊंचाइयों को पाने बाद अच्छा सोचें। आज हम जगत से ऊपर उठ गये सिद्धों की आराधना रूप श्री सर्वाथसिद्धि ग्रंथ राज का मंगलाचरण करने जा रहे हैं। ऐसे महान ग्रंथ की रचना सैकड़ों वर्षों पहले आचार्यश्री पूजपाद स्वामी ने जंगलों में बैठकर ताड़ पत्रों पर की थी।
२४ बर्ष बाद गृहस्थ जीवन के घर पर हुई आर्यिका अनर्घमति की आहार चर्या
चौबीस वर्ष बाद आर्यिका अनर्घमति माताजी अपने गृहस्थ जीवन के घर पहुंची जहां उनकी आहार चर्या हुई। इस दौरान उनके गृहस्थ जीवन के परिजनों की खुशी का ठिकाना न रहा और श्रावकों ने आर्यिकाश्री का पडगाहन किया। आर्यिका अनर्घमति माताजी के गृहस्थ जीवन के भाई विजय धुर्रा ने बताया कि जैन साधु संत किसी के घर नहीं जाते चाहें फिर वे अपने परिजन ही क्यों न हो। जब किसी श्रावक को पडगाहन विधि का सौभाग्य मिलता है तभी वह किसी के घर जाते हैं। उन्होंने बताया कि विधि पूर्वक आहार ग्रहण करने के बाद माताजी ने मां को भी समझाइश दी और परिवार से मोह कम रखने को कहा। इस दौरान सभी को आहार देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
Published on:
12 May 2022 09:18 pm
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