पाक में लोग मांग रहे हैं शांति का नोबेल, फिर इमरान परेशान क्‍यों?

  • बतौर स्‍टेट्समैन बुरे दौर से गुजर रहे हैं पाक पीएम
  • पीटीआई सरकार की नीतियां ही राह में सबसे बड़ी बाधा
  • आतंकवाद पर नरम नीति से विश्व बिरादरी में पड़े अलग-थलग

By: Dhirendra

Updated: 03 Mar 2019, 10:17 AM IST

नई दिल्ली। क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान पिछले 23 सालों से पाकिस्तान की राजनीति में सक्रिय हैं। वर्तमान में वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं। उनका दावा है कि आज का पाकिस्तान, नया पाकिस्तान है लेकिन पुलवामा आतंकी हमले के बाद से वो सबसे ज्‍यादा सुर्खियों में हैं। इतना ही नहीं, शांति के नाम पर भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान को छोड़ने के बाद से पाकिस्तान के लोग उन्हें नोबेल पीस प्राइज देने की मांग भी करने लगे हैं। बावजूद इसके खुद इमरान खान राजनीतिक जीवन के सबसे कठिनतम दौर से गुजर रहे हैं।

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संभवत: यही वजह है कि पाकिस्तान का पीएम बनने के 8 महीने बाद भी वह एक स्टेट्समैन के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान नहीं बनाए पाए हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का कहना है कि आज भी वो पाक सेना के प्रभाव में हैं। यही सवाल उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

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1. खुद के बुने जालों से निकलना मुश्किल

इमरान खान के सामने पहली चुनौती यह है कि उन्होंने पाकिस्तान के लोगों को भ्रष्टाचारमुक्त नया पाकिस्तान बनाने का वादा किया था। 2013 में जब नवाज शरीफ पाकिस्तान के पीएम बने थे तो इमरान खान नेधांधली होने और खुद के साथ ज्यादती होने का आरोप लगाया था। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उन्होंने नवाज शरीफ सरकार को सांस नहीं लेने दिया। 2018 के चुनाव में जब पीटीआई की जीत हुई तो पीएमएलएन और पीपीपी व अन्य पार्टियों ने भी उन पर चुनाव में गड़बड़ी कर सत्ता तक पहुंचने का आरोप लगाया था। अब विरोधी पार्टियां उन पर सेना के साथ मिलकर सरकार चलाने का आरोप लगा रही हैं। ऐसे में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम हो गया तो भी विरोधी पार्टियां राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी वादों से को लेकर उनके सामने सियासी चुनौतियां पेश कर सकती हैं। अगर ऐसा हुआ तो उनके लिए आने वाले समय में घरेलू मोर्चे पर उत्पन्न इन चुनौतियां का सामना करना मुश्किलों भरा होगा।

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2. खराब अर्थव्यवस्था

वर्तमान में पीटीआई सरकार का नया पाकिस्तान आर्थिक मोर्चे पर सबसे बुरे दौर में है। पाकिस्तानी रुपए का मूल्य गिरकर एक डॉलर के मुकाबले करीब 139 तक पहुंच गया है। टेरर फाइनेंसिंग की वजह से पाकिस्तान इस समय ग्रे लिस्ट में है और स्थिति में सुधार न होने पर कभी भी ब्लैकलिस्ट में शामिल किया जा सकता है। अधिकांश अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं पाकिस्तान सरकार को ऋण देने से मुंह मोड़ने लगी हैं। इस संकट से निपटने के लिए उन्होंने कई कद उठाएं हैं लेकिन 8 महीने बाद भी इमरान सरकार को तत्काल इससे राहत मिलने की उम्मीद कम है। जबकि पाकिस्तान में आर्थिक स्थिरता को बहाल करना सबसे पहली जरूरत है।

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3. चुनावी वादे
पाकिस्तान में करीब 9 महीने से इमरान सरकार है। 2018 में चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने युवाओं से पाकिस्तान से भष्टाचार समाप्त करने, सभी को रोजगार मुहैया कराने, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने, पाकिस्तान को आतंकवाद से मुक्ति दिलाने सहित कई वादे किए थे। इन वादों की वजह से वहां के युवाओं ने बड़े पैमाने पर वोट दिया था। अब वही युवा उनसे रोजगार मुहैया कराने और भ्रष्टाचार मिटाने की बात करने लगे हैं। अब राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भी पाकिस्तान का मजबूत विपक्ष उनके सामने नई समस्याएं खड़ी कर सकता है।

 

4. भारत से संबंधों सुधार न होना

जब नवाज शरीफ पाकिस्तान के पीएम थे तो इमरान कहा करते थे कि मियां नवाज का पीएम मोदी से दोस्ती है। वह भारत के साथ संबंधों के मामले में खुद के हितों को तवज्जो देते है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने इमरान नवाज शरीफ को इंडिया का एजेंट तक भी कह दिया था। इन आरोपों के घेरे में आकर नवाज को वाजपेयी के समय भी सता गंवानी पड़ी थी और मोदी के समय में तो उन्हें सत्ता बेदखल होने के साथ जेल की हवा भी खानी पड़ी। करीब एक साल पहले पाकिस्तान में चुनाव के समय पीटीआई प्रमुख ने कश्मीरियों को नैतिक समर्थन देने की बातें की थी। अब कश्मीर और आतंकवाद का मुद्दे पर वो देश के अंदर और बाहर चुनौतियों का सामना कर रहे है। भारत से हर हाल में द्विपक्षीय वार्ता शुरू करना चाहता हैं। पुलवामा के मुद्दे पर तनाव बढ़ने के बाद से जोरदार तरीके से शांति की अपील कर रहे हैं, लेकिन इस दिशा में अभी तक उन्हें सफलता नहीं मिली है। तो क्या आने वाले समय में उनके साथ भी वही होगा जो पूर्ववर्ती पाक प्रधानमंत्रियों के साथ होता रहा है?

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