
क्या है भद्रा
धार्मिक ग्रंथों और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भद्रा ग्रहों के राजा सूर्य देव की पुत्री और न्याय के देवता शनि की बहन हैं। शनि की तरह ही भद्रा का स्वभाव भी सख्त माना जाता है। इनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ब्रह्माजी ने इन्हें कालगणना या पंचांग में एक प्रमुख अंग विष्टिकरण में स्थान दिया है। इस काल में कुछ शुभ कार्यों, यात्रा और उत्पादन आदि को निषिद्ध किया गया है। इसलिए इस समय कई शुभ कार्यों को निषिद्ध माना गया है। हालांकि भद्राकाल में तंत्र कार्य, अदालती कार्य और राजनीतिक चुनाव कार्य अच्छे फल देने वाले माने गए हैं।
पंचांग में भद्रा का क्या महत्व है
पंचांगकर्ताओं के अनुसार कालगणना में पांच भाग होते हैं, तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण। इनमें करण तिथि का आधा भाग होता है। करण की संख्या 11 होती है और ये चर-अचर में बांटे गए हैं। चर यानी गतिशील करण में बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि गिने जाते हैं। अचर या अचलित करण में शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न शामिल हैं। इन 11 करणों में सातवें करण विष्टि का नाम ही भद्रा है। यह सदैव गतिशील होती है।
वैसे तो भद्रा का अर्थ कल्याण करने वाली है, लेकिन इस अर्थ के विपरीत भद्रा या विष्टि करण में शुभ कार्यों को निषिद्ध किया गया है। ज्योतिष के अनुसार भद्रा तीनों लोकों में घूमती है और मृत्युलोक में यह शुभ कार्यों में बाधक या उनका नाश करने वाली मानी जाती है।
ज्योतिषियों के अनुसार जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ और मीन राशि में विचरण करता है और भद्रा विष्टिकरण का योग होता है तभ भद्रा मृत्युलोक में रहती है। इस समय शुभ कार्यों पर रोक रहती है। इसके दोष के निवारण के लिए भद्रा व्रत का विधान भी धर्म ग्रंथों में बताया गया है।
कैसे हुई भद्रा की उत्पत्ति
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भद्रा की उत्पत्ति दैत्यों के नाश के लिए सूर्य नारायण और देवी छाया की पुत्री के रूप में गधे के मुंह, लंबे पूंछ और तीन पैर युक्त हुई थी। यह काले वर्ण, लंबे केश, बड़े दांत और भयंकर वेश वाली है। जन्म लेते ही भद्रा यज्ञ में विघ्न डालने लगी, मंगल कार्यों में उपद्रव कर सारी सृष्टि को प्रताड़ित करने लगी। भद्रा के खराब व्यवहार के कारण सूर्य देव को इसके विवाह की चिंता थी, पर कोई भी देवता इसके के लिए राजी नहीं था। इस पर सूर्य नारायण ने ब्रह्माजी से परामर्श मांगा।
तब ब्रह्माजी ने विष्टि से कहा कि भद्रे, बव, बालव, कौलव आदि करणों के अंत में तुम निवास करो और जब व्यक्ति तुम्हारे समय में गृह प्रवेश और मांगलिक कार्य करे तभी विघ्न डालो। जो तुम्हारा आदर न करे, उसका काम बिगाड़ देना। यह उपदेश देकर ब्रह्माजी अपने लोक को चले गए और भद्रा देव दानव मानव सभी प्राणियों को कष्ट देते घूमने लगी।
कब रहती है भद्रा
ज्योतिषियों के अनुसार कृष्ण पक्ष की तृतीया, दशमी, शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी, एकादशी के उत्तरार्ध में और कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, सप्तमी और शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णमासी के पूर्वार्ध भद्रा रहती है।
इस समय शुभ होती है भद्रा
ज्योतिषियों के अनुसार तिथि के पूर्वार्ध की भद्रा दिन की भद्रा, तिथि के उत्तरार्ध की भद्रा रात की भद्रा कहलाती है। यदि दिन की भद्रा रात के समय और रात की भद्रा दिन के समय पड़े तो भद्रा को शुभ मानते हैं। यदि भद्रा में कोई काम करना भी हो तो भद्रा के शुरुआत की पांच घटी यानी मुख की भद्रा का समय जरूर छोड़ देना चाहिए। ज्योतिषियों के अनुसार भद्रा 5 घटी मुख में, 2 घटी कंठ और 11 घटी हृदय में रहती है, जबकि 4 घटी पुच्छ में रहती है।
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भद्रा के दोष और प्रभाव
1. जब भद्रा मुख में हो तो कार्य का नाश होता है।
2. जब भद्रा कंठ में रहे तो धन का नाश होता है।
3. जब भद्रा हृदय में रहे तो प्राण का नाश होता है।
4. जब भद्रा पूछ में हो तो विजय प्राप्त होती है और कार्य सिद्ध होते हैं।
Updated on:
17 Mar 2024 03:58 pm
Published on:
30 Aug 2023 05:44 pm
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