scriptshri ram the soul of india's heart area | श्री राम का देश के दिल से है खास नाता, जानें कुछ खास बातें... | Patrika News

श्री राम का देश के दिल से है खास नाता, जानें कुछ खास बातें...

दुनिया के एकमात्र मां सीता के मंदिर से लेकर श्रीराम की ननिहाल तक...

भोपाल

Updated: August 05, 2020 05:41:01 pm

तकरीबन पांच सौ सालों से रामभक्तों को इंतजार के बाद आखिरकार आज वह क्षण आ ही गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार दोपहर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए आधारशिला रखी। ऐसे में आज हम एक ऐसे प्रदेश के बारे में बता रहे हैं, जिसे हिंदुस्तान का दिल भी कहा जाता है और यहां से श्री राम जी का खास नाता भी है।

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जी हां, भगवान श्री राम मध्यप्रदेश के रग-रग में बसे हैं, यह कहना तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भले ही पूरे देश में श्री राम के अनेक मंदिर होने के साथ ही वे हर सनातनधर्मी के आराध्य हैं, लेकिन श्री राम का मध्यप्रदेश से रिश्ता ही कुछ ऐसा है कि यदि श्री राम को मध्यप्रदेश से खास रिश्ता है वे यहां के लिए अत्यधिक खास हो जाते हैं।

जानकारों के अनुसार श्रीराम का इस मप्र (अविभाज्य) से रिश्ता वैसा ही है जैसा किसी बच्चे का अपने ननिहाल से होता है। हो भी कैसे नहीं आखिर मां कौशल्या तो यहीं की थी अत: श्रीराम का ननिहाल भी यही प्रदेश रहा है, लेकिन इसके बावजूद श्री राम का इस राज्य से जुड़ाव काफी ज्यादा दिखता है।

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मध्यप्रदेश एकमात्र विश्व की ऐसी जगह है जहां श्री राम राजा रूप में विराजित हैं, तो वहीं कई स्थानों पर वह सन्यासी रूप में भी रहे हैं। बताया जाता है कि दुनिया का एकमात्र मां सीता का मंदिर भी इसी प्रदेश में है, तो वहीं श्रीराम के पुत्रों का जन्म हो या उनके राज्य की बात हर ओर से श्रीराम जहां इस प्रदेश से जुड़े दिखते हैं, वहीं यहां के लोगों के रग-रग में बसे भी हुए हैं।

सन्यासी का भेष चित्रकूट में :
प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम कुरई(उप्र) से आगे चलकर अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी मां सीता सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है।

हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। यहीं से प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। चित्रकूट वही स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भरत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

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daksin_ki_ayodhya.jpgमर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम का जितना नाता अयोध्या से है, उतना ही नाता उनका बुंदेलखंड से भी है । बुंदेलखंड की पावन धरा चित्रकूट में उन्होंने अपना वनवास काल का कुछ समय बिताया और दैत्यों के संहार के लिए उन्होंने पन्ना के सारंग धाम में धनुष भी उठाया था।
राजा राम ओरछा में :
यह विश्व का अकेला मंदिर है जहां राम की पूजा राजा के रूप में होती है और उन्हें सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात सलामी दी जाती है। ओरछा को दूसरी अयोध्या के रूप में मान्यता प्राप्त है। यहां पर रामराजा अपने बाल रूप में विराजमान हैं। यह जनश्रुति है कि श्रीराम दिन में यहां तो रात्रि में अयोध्या विश्राम करते हैं।
रामराजा के अयोध्या से ओरछा आने की एक मनोहारी कथा है। एक दिन ओरछा नरेश मधुकरशाह ने अपनी पत्नी गणेशकुंवरि से कृष्ण उपासना के इरादे से वृंदावन चलने को कहा। लेकिन रानी राम भक्त थीं। उन्होंने वृंदावन जाने से मना कर दिया।
क्रोध में आकर राजा ने उनसे कहा कि तुम इतनी राम भक्त हो तो जाकर अपने राम को ओरछा ले आओ। रानी ने अयोध्या पहुंचकर सरयू नदी के किनारे लक्ष्मण किले के पास अपनी कुटी बनाकर साधना आरंभ की।

इन्हीं दिनों संत शिरोमणि तुलसीदास भी अयोध्या में साधनारत थे। संत से आशीर्वाद पाकर रानी की आराधना दृढ़ से दृढ़तर होती गई। लेकिन रानी को कई महीनों तक रामराजा के दर्शन नहीं हुए। अंतत: वह निराश होकर अपने प्राण त्यागने सरयू की मझधार में कूद पड़ी। यहीं जल की अतल गहराइयों में उन्हें रामराजा के दर्शन हुए। रानी ने उन्हें अपना मंतव्य बताया।

चतुर्भुज मंदिर का निर्माण:
सारी बात सुनकर रामराजा ने ओरछा चलना स्वीकार किया किन्तु उन्होंने तीन शर्तें रखीं-
पहली- यह यात्रा पैदल होगी।
दूसरी- यात्रा केवल पुष्य नक्षत्र में होगी।
तीसरी- रामराजा की मूर्ति जिस जगह रखी जाएगी वहां से पुन: नहीं उठेगी।

इसके बाद रानी ने राजा को संदेश भेजा कि वे रामराजा को लेकर ओरछा आ रहीं हैं। राजा मधुकरशाह ने रामराजा के विग्रह को स्थापित करने के लिए करोड़ों की लागत से चतुर्भुज मंदिर का निर्माण कराया।

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जब रानी ओरछा पहुंची तो उन्होंने यह मूर्ति अपने महल में रख दी। यह निश्चित हुआ कि शुभ मुर्हूत में मूर्ति को चतुर्भुज मंदिर में रखकर इसकी प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। लेकिन राम के इस विग्रह ने चतुर्भुज जाने से मना कर दिया।

कहते हैं कि राम यहां बाल रूप में आए और बोले कि अपनी मां का महल छोडक़र वो मंदिर में कैसे जा सकते थे। इसके बाद से राम आज भी इसी महल में विराजमान हैं और उनके लिए बना करोड़ों का चतुर्भुज मंदिर आज भी वीरान पड़ा है। यह मंदिर आज भी मूर्ति विहीन है। यह भी एक संयोग ही है कि जिस संवत 1631 को रामराजा का ओरछा में आगमन हुआ, उसी दिन रामचरित मानस का लेखन भी पूर्ण हुआ।

जो मूर्ति ओरछा में विद्यमान है उसके बारे में बताया जाता है कि जब राम वनवास जा रहे थे तो उन्होंने अपनी एक बाल मूर्ति मां कौशल्या को दी थी। मां कौशल्या उसी को बाल भोग लगाया करती थीं। जब राम अयोध्या लौटे तो कौशल्या ने यह
मूर्ति सरयू नदी में विसर्जित कर दी। यही मूर्ति गणेशकुंवरि को सरयू की मझधार में मिली थी। यहां राम ओरछाधीश के रूप में मान्य हैं।

यहां के भांजे हैं श्रीराम :
गुप्तेश्वर धाम के पीठाधीश्वर स्वामी डॉ. मुकुंददास महाराज के अनुसार वाल्मिक रामायण और वशिष्ठ रामायण में प्रदेश के दक्षिण पश्चिम क्षेत्र में रावण की चौकियां हुआ करती थीं। महाकौशल क्षेत्र जिमसें कुछ हिस्सा अब छत्तीसगढ़ चला गया है, भी शामिल था।
यही महाकौशल माता कौशल्या का मायका कहलाता है। जिसमें 18 से अधिक जिले हुए करते थे। जब राजा दशरथ ने राजसूय यज्ञ किया तब वे विंध्य के राजाओं से मिलने भी आए, जहां माता कौशल्या को देखकर प्रभावित हुए और उन्हें अपनी रानी बना लिया। यही नहीं श्रीराम जब वनवास गए तब वे ननिहाल होते हुए ही दक्षिण भारत की ओर गए थे।
इसलिए छुए जाते हैं भांजों के पैर:
भगवान राम की माता कौशल्या महाकौशल क्षेत्र में जन्म थीं। राम पूज्य थे। उनके चरण वंदन के साथ शुरू हुई परम्परा यहां आज भी निभायी जाती है। भगवान राम को भांजा माना जाता है और इसके फलस्वरूप लोग अपने भांजों के भी चरण स्पर्श करते हैं।

रानी दुर्गावती यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति डॉ. सुरेश्वर शर्मा ने श्रीराम और रामायण पर रिसर्च में बताया कि पूर्व में उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल दो राज्य हुआ करते थे। जो वर्तमान में उत्तर कोशल-उत्तर प्रदेश बना और दक्षिण कोशल विभाजन पूर्व का मध्यप्रदेश कहलाता है।

वाल्मीकि और वशिष्ठ रामायण में स्पष्ट लिखा कि मप्र का महाकोशल क्षेत्र माता कौशल्या का मायका हुआ करता था। छत्तीसगढ़ के लोग आज भी प्रदेश को श्रीराम का ननिहाल मानते हैं। मध्य प्रदेश में भले ही कम लोगों को इस बात की जानकारी हो, लेकिन यह सच है कि श्रीराम को भांजा मानते हुए यहां लोग आज भी अपने भांजों के पैर छूते हैं। भांजे को पूज्य माना जाता है।

विदिशा में वनवासी का रूप :
अयोध्या से निकलकर जब प्रभु श्रीराम वनवास पर गए थे, तब उन्होंने विदिशा में कुछ वक्त बिताया था। यहां एक पत्थर पर चरणों के निशान हैं जो श्रीराम के बताए जाते हैं और जो हजारों साल से ऐसे ही विदिशा में बने हुए हैं। इन्हें त्रेतायुग का ही बताया जाता है। जहां ये चरण हैं, उस जगह को चरणतीर्थ के नाम से जाना जाता है।

इतिहास में भी है इसका जिक्र :
इतिहासकार निरंजन वर्मा के मुताबिक त्रेता युग में भगवान राम ने अश्वमेघ यज्ञ किया तो विदिशा को शत्रुघ्न ने यादवों से युद्ध के बाद ही जीता था। बाद में जब रामराज्य विभाजन का समय आया तो इस प्रदेश को महाराजा शत्रुघ्न के पुत्र शत्रुघाती को दे दिया गया (वाल्मिकी रामायण में भी इसका जिक्र है)। उस समय आसपास का प्रदेश दशार्ण तथा इसकी राजधानी विदिशा कहलाती थी, महर्षि वाल्मिकी से भी यह क्षेत्र जुड़ा माना जाता है।

अशोकनगर में हुआ पुत्रों का जन्म:
रामायण के अनुसार माता सीता के पुत्रों लव-कुश का जन्म वाल्मीकि आश्रम में हुआ था। वाल्मीकि के जिस आश्रम में माता जानकी ने पुत्रों को जन्म दिया था वो आश्रम मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले की तहसील मुंगावली में स्थित है। जहां आज भी लोग बड़े धूम-धाम से भगवान राम और माता जानकी के पुत्रों लव-कुश के जन्मदिन को धूमधाम से मनाते हैं, इस स्थान पर माता सीता ने अपना निर्वासन बिताया था और यहीं लव-कुश का जन्म हुआ था।

इकलौता सीता माता का मंदिर:
अशोक नगर क्षेत्र के ही करीला में मां सीता का मंदिर स्थित है, ये देश का इकलौता मंदिर है जहां सीता भगवान राम के साथ नहीं है। मंदिर में लव-कुश के साथ मां सीता और महर्षि वाल्मीकि की मूर्ति है। मां सीता का मंदिर आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। कहा जाता है कि यहां सच्चे मन से मनोकामना करने पर जरूर पूरी होती है।

भभूत का उपयोग करते हैं किसान:
करीला स्थित मां जानकी मंदिर की भभूति को आसपास के किसान फसलों में कीटाणु नाशक और इल्लीनाशक के रूप में प्रयोग करते हैं। इस भभूति को फसल पर डालने से चमत्कारी ढंग से फसल से इल्लियां गायब हो जाती हैं। जिससे हर साल किसान इसका प्रयोग अपनी फसलों को स्वस्थ्य रखने में करते हैं।

श्रीराम के पुत्र कुश का राज्य:
कहते हैं जब श्रीराम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया। राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था।

यानि भगवान श्रीराम के पुत्र कुश का राज्य दक्षिण कोसल में था। वहीं कहा जाता है कि कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था।

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