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यूपी के इस जिले में तैयार हो रहा कल्पवृक्ष, शास्त्रों में बखान है इसकी महत्ता और खूबियां

आस्ट्रेलिया से आयातित पौराणिक दुर्लभ वृक्ष को कौतुहलवश देखने उमड़ रहे लोग

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 kalp vraksha

यूपी के इस जिले में तैयार हो रहा कल्पवृक्ष, शास्त्रों में बखान है इसकी महत्ता और खूबियां

औरैया. समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में एक कल्पवृक्ष की महत्ता का बखान शास्त्रों में भी है। कल्पवृक्ष को सृष्टि के निर्माण में अहम महत्वपूर्ण माना गया है। इस्लाम में इसके दूसरे पर्यायवाची तूवा वृक्ष का उल्लेख मानव सभ्यता से गहरे रिश्तों को उजागर करता है। मौजूदा समय में इस वृक्ष को जिले में उगाना सकारात्मकता की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रहा है। यहां रोजाना बड़ी संख्या में लोग कल्पवृक्ष के दर्शन करने आ रहे हैं।

जिले के भगवत विश्नोई ने एक आला अफसर के सहयोग से इस दिव्य और पारलौकिक रहस्य से परिपूर्ण कल्पवृक्ष को रोपित करने में सफलता हासिल कर ली है। पद्मपुराण के अनुसार, कल्पवृक्ष समुद्र मंथन से निकला है, बाद में जिसे देवताओं के राजा इंद्र ने स्वर्ग अर्थात हिमालय के उत्तरी भाग में सुरकानन वन में लगाया था। धार्मिक मान्यता है कि इसके नीचे बैठकर मांगी गयी मनोती शीघ्र ही फलीभूत होती है। इसीलिए इसे परोपकारी वृक्ष कहा जाता है।

कल्पवृक्ष को कल्पद्रुप, कल्पतरु, सुरतरु, देवतरु, कल्पलता और संस्क्रत में मन्सरा भी कहते हैं। इस वृक्ष की उम्र कल्पान्त यानि 2500 वर्ष तक होती है। आम की पत्तियों जैसी शक्ल और वरगद जैसे तने वाले कल्पवृक्ष के चमत्कारिक गुणों का बखान इस्लामिक पुस्तकों में तूबा वृक्ष के रूप में भी है। इसे नेक बंदों को अल्लाह के बसाए अदन में छांव के दीदार का हुक्म बताया गया है। इसकी समानताएं मानव सभ्यता के विकाश से गहरे जुड़ाव की और इसकी महत्ता और महत्व को स्पष्ट करती हैं।

ऐसे सम्भव हुआ कल्प रोपण
पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के प्रयासों से आस्ट्रेलिया से आयात किये गए कुछ कल्पवृक्षों को उनके ड्रीम प्रोजेक्ट लायन सफारी में लगाया जाना था, जहां देखरेख का जिम्मा उठाए एक आला अफसर ने भगवत विश्नोई को एक वृक्ष मुहैया कराया था। इस वृक्ष को उन्होंने कड़े परिश्रम और उचित देखरेख से तैयार किया जो अभी शैशव अवस्था में फल फूल रहा है। पूछने पर बताते हैं कि इसका एक गुण यह भी है यह निश्चल मन से लगाने पर ही जीवित रहता है। समय-समय पर इसको हवन और धार्मिक अनुष्ठान कराकर ऊर्जा के बल पर सिंचित करना पड़ता है।

वैज्ञानिक दृष्टि में महत्व
ओलिऐसी कुल के इस वृक्ष का नाम औलिया कस्पी डाटा है। यह फ़्रांस व इटली सहित आस्ट्रेलिया के मरुस्थलीय इलाकों में पाया जाता है। भारत में इसका वास्तविक नाम बम्बोकेसी है। इसको सर्वप्रथम फ़्रांसिसी बैज्ञानिक माइकल एडसनन ने 1775 में अफ्रीका के सेनेगल में देखकर धर्मशास्त्रों में बताई गयी विशेषताओं के रूप में कल्पवृक्ष होने की पुष्टि की थी। इसे वाओआबो भी कहा जाता है। विज्ञान के अनुसार यह परोपकारी मेडिसनल प्लांट है, जिसमें सन्तरे से 6 गुना ज्यादा विटामिन सी तथा गाय से दोगुना कैल्सियम के अलावा सभी तरह के विटामिन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसके फूल कमल के फूल में रखी किसी छोटी सी गेंद से निकले असंख्य रुओं की तरह होती है जो वातावरण में एंटी एनर्जी को लगभग खत्म सा कर देती है। इसकी उम्र के बारे में अभी तक कोई सटीक जानकारी नहीं जुटाई जा सकी है बारहहाल कुछ बैज्ञानिको ने इसकी उम्र हजारो वर्ष का आकलन जरूर किया है।

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