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वन जा रहे भगवान राम वापस नहीं आए तो भरत नंदीग्राम में करने लगे तपस्या

Ram Mandir Katha: पत्रिका राम मंदिर कथा के अध्याय-7 में हम आपको नंदीग्राम के बारे में बताएंगे, जो अयोध्या से 20 किलोमीटर दूर है। साथ ही नागेश्वरनाथ मंदिर के इतिहास के बारे में भी जानकारी देंगे। पढ़िए राहुल मिश्रा और मार्कण्डेय पाण्डेय की विशेष रिपोर्ट...

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अयोध्या से महज 20 किलोमीटर दूरी पर स्थित नंदीग्राम भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम पृष्ठ है जो आज भी भातृप्रेम, त्याग और साधना अतुलनीय तीर्थ है। नंद्रीग्राम को ही भरतकुंड के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान न सिर्फ धार्मिक स्थल है, बल्कि त्रेता युगकालीन भगवान राम के अनुज महाराज भरत की तपोभूमि भी है। अयोध्या से करीब 20 किलोमीटर दूर इस स्थल का उदाहरण तुलसीदास कृत रामायण, वाल्मीकि रामायण सहित विभिन्न धर्मग्रंथों में मिलता है। आइए आपको ले चलते हैं नंदीग्राम…

भगवान राम के वन गमन के बाद चित्रकूट गए। इसकी सूचना उनके भाई भरत को जैसे ही मिली वह प्रभु श्रीराम को मनाने के लिए चल पड़े। जब वह भाई को वापस लाने में सफल नहीं हुए तो उन्होंने भगवान की चरण पादुका ही मांग ली और स्वयं निराश मन से अयोध्या वापस लौट आये। इसके बाद अयोध्या से 20 किलोमीटर दूर नंदीग्राम में तपस्वी की भांति रहने का प्रण कर लिया।

वाल्मीकि रामायण में 115वें सर्ग के दूसरे श्लोक में महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है...

नन्दीग्रामं गमिष्यति मातृश्ता सर्वानामंत्रयेउत्र।
तत्र दु:खमिदं सर्वम सहिष्ये राघवं बिना।।


भरत महाराज कहते हैं कि अब मैं नन्दीग्राम जाऊंगा। इसके लिए आप सब की आज्ञा चाहता हूं। मैं वहीं श्रीराम के बिना प्राप्त होने वाले सभी दुख सहन करूंगा। वाल्मीकि रामायण में आगे लिखा है कि उन्होंने माताओं और कुलपुरोहित वशिष्ठ जी से आज्ञा लेकर नन्दीग्राम की ओर प्रस्थान कर दिया। उनके आगे बढ़ते ही हाथी, घोड़े और रथों से सजी सेना और अयोध्या वासी भी उनके पीछे चल दिये। अयोध्या से प्रस्थान के दौरान भरत ने भगवान श्रीराम की चरण पादुका अपने साथ ले रखी थी। नन्दीग्राम पहुंचने पर साथ आए लोगों से कहा कि आप सब इन चरण पादुका के ऊपर छत्र धारण करो, मैं इन्हें आर्य रामचंद्र जी के साक्षात चरण मानता हूं। मेरे गुरु की इन चरण पादुकाओं से ही इस राज्य में धर्म की स्थापना होगी। इसके उपरांत भरत ने स्वयं तपस्वी का वेष धारण कर लिया और उसी वेष में अयोध्या पर शासन करने लगे।

नंदीग्राम भाई के प्रेम का गवाह बना
नंदीग्राम में कुटिया डालकर वे तपस्या करने लगे। उन्होंने जटाएं धारण की और मुनि वेष धारण कर नन्दीग्राम में निवास करने लगे। महान भ्रातृप्रेम का गवाह नन्दीग्राम आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। भरत महाराज की तपोस्थली, हनुमान-भरत मिलन स्थल, सैकड़ों वर्ष पुराना बरगद का पेड़ आस्था के केंद्र बिंदु हैं। भरत जिस कुंड में स्नान करते थे उसे विकसित कर आज सरोवर का रूप दे दिया गया है। किंवदंतियों के आसार नन्दीग्राम से करीब दो कोस की दूरी पर स्थित पुहंपी, जिसका पूर्व नाम पहुंची बताया जाता है, जहां पर लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम का विमान अयोध्या की सीमा में उतरा था।

भगवान श्रीराम ने अपने साम्राज्य को 8 भागों में बांटा
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान् श्रीराम ने अपने समस्त साम्राज्य को आठ भागों में बांटकर अपने दोनों पुत्रों लव-कुश के अतिरिक्त अन्य तीनों भाइयों के छह पुत्रों में बराबर-बराबर वितरित कर दिया। अंत में अयोध्या राज्य की रक्षा का भार हनुमान जी को देकर साकेत धाम को प्रस्थान कर गये। इस प्रकार महाराज लव को लवपुर (लाहौर) तथा कुश को कौशाम्बी का राज्य प्राप्त हुआ। कालान्तर में कुश ने अयोध्यापुरी की अधिष्ठात्री की प्रेरणा से निश्चय किया कि अपनी मातृभूमि अयोध्या का दर्शन-वन्दन करना चाहिए। इसी विचार से वे अयोध्या आये और स्वर्गद्वार तीर्थ में स्नान-वन्दन करने लगे। इसी बीच उनके हाथ का वह कंकण यानी कंगन जो कि महर्षि अगस्त्य के द्वारा महाराज राम को दिया गया था। उन्होंने उसे कुश को दिया था, सरयू के जल में गिर गया। जो नागकन्या कुमुदिनी को जल में विचरण करते समय मिल गया। इससे कुश बहुत विचलित हो उठे और अपने साथ आई सेना को उसे ढूंढ़ने के हुक्म दे दिया।


जब महाराज कुश को कंकण नहीं प्राप्त हुआ तो उन्होंने यह विचार किया कि इस तीर्थ के निकट रहने वाला नागराज जिसका नाम कुमुद है, उसी ने वह कंकण छिपाया होगा। अत: उन्होंने उस नाग को मार डालने के लिये प्रत्यंचा पर बाण चढ़ा लिया।

कुश ने भगवान शंकर की पूजा की
जब कुमुद नाग ने अपने प्राणों पर महान संकट आया देखा, तो वह अपने परम आराध्य श्रीशंकरजी की प्रार्थना करने लगा। शंकरजी कुमुद की प्रार्थना से प्रसन्न होकर वहां आये तथा महाराज कुश से क्रोध शांत करने के लिये कहा और नागराज कुमुद को अभय प्रदान किया। नागराज के रक्षणार्थ भगवान शंकर के आगमन के कारण महाराज कुश ने भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करके उनकी वहीं पर स्थापना की। उसी स्थान पर एक मंदिर का निर्माण कराया, जिसका नाम नागेश्वरनाथ पड़ा। नागेश्वर-मीमांसा में वर्णित कथा के अनुसार नागराज कुमुद के निवेदन पर कुश जी ने उसकी पुत्री से विवाह कर लिया।


गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित अयोध्या दर्शन में बताया गया है कि ईसा की छठी शताब्दी में हूण नरेश कामान्दार ने पाटलीपुत्र के बौद्ध धर्मावलम्बी राजा बृहद्बल (वज्रनाभ) से इस शर्त पर सन्धि की कि वह पाटलीपुत्र पर आक्रमण नहीं करेगा। इसके बदले में वह मथुरा पर अधिकार कर ले। उसने आक्रमण करके मथुरा के सभी मन्दिरों को ध्वस्त कर दिया।

मंदिर के सात कलशों पर 72 मन सोना चढ़ाया गया था
इसके बाद वह अयोध्या की ओर बढ़ा। उसकी दृष्टि अयोध्या के सर्वाधिक संपन्न मन्दिर श्रीनागेश्वरनाथ पर पड़ी और उसने इस पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेज इतिहासकार श्रीकनिंघम के अनुसार, अयोध्याके करीब-करीब सभी मंदिर अपनी-अपनी सुंदरता में बेजोड़ हैं। किंतु अयोध्या का सात शिखरों वाला नागेश्वर मन्दिर, जो सुनहरे मंदिर के नाम से विख्यात था-कहा जाता है कि इस मंदिर के सात कलशों पर 72 मन सोना चढ़ाया गया था, जिसे हूणों ने उतार कर लूट लिया। तबसे फिर उस पर सोना चढ़ाया न जा सका। कालान्तर में पाटलीपुत्र के राजा बृहद्बल की हत्या करके उसके सेनापति पुष्यमित्र ने कोसल की राजधानी अयोध्या की ओर कूच किया, जिससे हूण राजा कामान्दार पुष्यमित्र के हाथों मारा गया। उसकी फौज का एक भी आदमी जीवित नहीं बचा, जो लौटकर यह खबर दे सके कि अयोध्या की लड़ाई में सभी हूण मौत के घाट एक साथ उतार दिये गये।

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