जामी की परम्परा उर्दू की है। उनके ऊपर अपने पिता कैफी साहब के साथ ही इकबाल, हाली, चकबस्त, और सुरूर की राष्ट्रीय कविताओं का प्रभाव पड़ा और समसामयिक कवियों में शमीम करहानी, कैफी आज़मी, बेकल उत्साही, सागर आज़मी, बिस्मिल इलाहाबादी आदी कविताओं के ढॉंचे में उन्होंनें भी अपने काव्य को ढालने का प्रयास किया। उन्होने विश्वनाथ लाल शैदा से भी प्रेरणा पाई थी। शैदा भी जामी के पिता कैफी साहब के योग्य शिष्यो में से थे । जामी को उर्दू का शायर कहा जाए या हिन्दी का कवि यह एक प्रश्न है । इन्हे दोनों ही कहा जा सकता है पर वे उर्दू की उस परम्परा के कवि नहीं जिनके लिए कहा गया है कि श्नही है सहल दाग़ यारो से कह दो, की आती है उर्दू ज़बा आते आते। और न ही वे उस हिन्दी के कवि है जो दुरूह शब्दो के बोझ से लदी हो । वे उस उर्दू के कवि थे जो हिन्दी की बेशक एक शैली है और सचमुच वह हिन्दी की सगी बहन है। जामी की कविताओं की महत्ता उनके शुद्व राष्ट्रीय सोच के कारण है उनमें एक सच्चे भारतीय का हृदय था। जैसे गंगा-यमुना के पवित्र जल में वह आस्था है जो आबे ज़मज़म से किसी भी तरह कम नही है। स्वामी विवेकानंद के उस संदेश को कि आज भारतवासीयों के लिए भारत माता ही एकमात्र उपास्य है, इस कवि ने आत्मसात किया और वह बड़े अभिमान के साथ इस पुस्तक में लिखता है कि