
बाहुबली नेता रमाकांत यादव
आजमगढ़. जिला ही नहीं देश की राजनीति में चर्चित नाम है रमाकांत यादव। हो भी क्यों न, रमाकांत यादव चार बार विधानसभा तो इतनी ही बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके है वह भी अलग अलग दलों से। रमाकांत के बारे में कहा जाता है कि कुर्सी नहीं छोड़ सकते बल्कि कुर्सी के लिए किसी को भी छोड़ सकते है और इसके लिए वे दुश्मन से भी हाथ मिलाने में गुरेज नहीं करते। उनका राजनीतिक कैरियर खुद इस बात की गवाही देता है।
भाजपा में आने के बाद रमाकांत यादव ने दावा किया था कि वे तो दूर उनकी लाश भी सपा में नहीं जाएगी लेकिन इसी रमाकांत ने अभी हाल में सपा की जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी बचाने में मदद की। अब चर्चा है कि लोकसभा से पहले रमाकांत फिर सपा में जा सकते हैं, कारण कि उन्हें सपा और बसपा के गठबंधन से खतरा महसूस होने लगा है। यही वजह है कि पार्टी के विरोध के बाद भी जिस योगी आदित्यनाथ ने इन्हें भाजपा में शामिल कराया आज वे उसी के खिलाफ मोर्चा खोल दिये है।
गौर करें तो रमाकांत यादव ने वर्ष 1984 में जगजीवन राम की पार्टी कांग्रेस जे से अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत की थी। वर्ष 1985 में रमाकांत यादव इसी दल के टिकट पर फूलपुर विधानसभा से पहली बार विधायक चुने गए थे। वर्ष 1993 में सपा के गठन के बाद रमाकांत यादव सपा में शामिल हो गए। वर्ष 1985 से वर्ष 1995 के मध्य रमाकांत यादव चार बार विधायक चुने गए। वर्ष 1993 में रमाकांत यादव सपा से विधायक चुने गए थे।
यूपी में सपा बसपा गठबंधन की सरकार बनी थी। 2 जून वर्ष 1995 को मायावती के समर्थन वापस लेने के बाद सरकार अल्पमत में आ गयी थी। उस समय सरकार बचाने के लिए गेस्ट हाउस कांड हुआ था। इस कांड में रमाकांत यादव और उनके भाई उमाकांत यादव पर मायावती का कपड़ा फाड़ने और बदसलूकी करने का आरोप लगा था। इस घटना के बाद रमाकांत यादव मुलायम सिंह यादव के काफी करीबी हो गये थे। तत्कालीन सपा मुखिया मुलायम सिंह ने रमाकांत यादव के सरकार बचाने के एहसान का बदला रमाकांत को एक हत्या के मामले में बचा कर किया था। वह ऐसा दौर था जब रमाकांत यादव मुलायम के साथ हेलीकाप्टर में घूमते थे लेकिन रमाकांत मुलायम सिंह यादव से भी दोस्ती लंबे समय तक नहीं निभा सके।
वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव के पहले रमाकांत ने सपा को छोड़कर बसपा का दामन था लिया। यह राजनीति की सबसे चर्चित घटना रही। कारण कि मायावती ने गेस्टहाउस कांड को भूलकर रमाकांत यादव को बसपा में न केवल शामिल किया था बल्कि आजमगढ़ से टिकट भी दे दिया था लेकिन रमाकांत यादव कुछ समय बाद ही अपने को इस पार्टी में असहज महसूस करने लगे और ऐसा माहौल बनाया कि बसपा मुखिया कार्रवाई करें। 2007 में हुआ भी ऐसा रमाकांत ने फिर सपा में जाने के प्रयास किया लेकिन पार्टी में उनके विरोधी भारी पड़े, सपा में उनकी बात नहीं बनी तो वे गोरक्ष पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ की शरण में चले गए।
बीजेपी से जुड़े सूत्रों की माने तो उस समय बीजेपी रमाकांत को पार्टी में नहीं लेनी चाहती थी लेकिन योगी के दबाव में पार्टी ने न केवल रमाकांत को गले लगाया वल्कि 2008 के उपचुनाव में टिकट भी दे दिया। उस समय मायावती ने बड़ा दांव खेला और रमाकांत यादव को पूर्व में मात दे चुके अकबर अहमद डंपी को मैदान में उतार दिया। डंपी ने दूसरी बार रमाकांत यादव को चुनाव में चित्त कर दिया।
वर्ष 2009 के आम चुनाव में बीजेपी ने फिर रमाकांत यादव को मैदान में उतारा और वे जीत गए लेकिन केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी, पांच साल तक रमाकांत यादव सत्ता से दूर रहे। वर्ष 2014 के लोकसभा में रमाकांत को फिर चुनाव में हार का सामना करना पड़ा जबकि बीजेपी ने देश में प्रचंड बहुमत हासिल किया। बीजेपी के सत्ता में आने के बाद रमाकांत यादव के लोगों को ठेके तो मिले लेकिन सत्ता का सुख नहीं मिल पाया। संगठन में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और सीएम योगी आदित्यनाथ को छोड़ दिया जाय तो रमाकांत की किसी से बनती भी नहीं है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ पहले ही रमाकांत यादव मोर्चा खोल चुके है।
सूत्रों की माने तो पार्टी में रमाकांत यादव की मनमानी नहीं चल पा रही। उदाहरण के तौर पर बगावत के बाद भी रमाकांत को विधानसभा में पांच के बजाय सिर्फ एक टिकट मिला। अब सपा और बसपा के बीच गठबंधन की जमीन तैयार होते देख रमाकांत को अपने राजनीतिक कैरियर की भी चिंता होने लगी है। कारण कि उनकी सवर्ण विरोधी छबि है जिसके कारण कुछ प्रतिशत सवर्ण चुनाव में उनका विरोध करेंगे इसके कोई शक नहीं है। गठबंधन की स्थित में यादव भी रमाकांत का साथ छोड़ सकता है। इसलिए रमाकांत यादव ने उप चुनाव के बाद अपने सबसे खास सीएम योगी आदित्यनाथ के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिये है।
राजनीति के जानकार कहते है कि रमाकांत चाहते हैं कि पार्टी उनके खिलाफ कार्रवाई करें ताकि उनके पास यह कहने का मौका हो कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी बल्कि सवर्णो की पार्टी में उन्हें दरकिनार कर दिया। यही वजह है कि रमाकांत पार्टी के खिलाफ लगातार हमले कर रहे हैं। अब तक पार्टी न रमाकांत के बागी तेवर को लगातार नजर अंदाज किया। अब लोगों की नजर पार्टी के साथ ही रमाकांत यादव पर टिकी है। कारण कि यह चर्चा आम है कि जून माह तक रमाकांत बीजेपी को बाय कह सपा का दामन थाम सकते है। वैसे यह इतना आसान भी नहीं है कारण कि सपा में रमाकांत के कई विरोधी है जो नहीं चाहेंगे कि वापसी करें।
Published on:
17 Mar 2018 04:19 pm

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