
सुबह से शाम तक लगा रहता है भक्तों का तांता
आजमगढ़. नगर कोतवाली चौक के पास मां के दरबार में आने वाले हर भक्त की मुराद पूरी होती है। यह कोई आम मंदिर नहीं बल्कि यहां दक्षिण मुखी देवी विराजमान है। दक्षिण एशिया में ऐसे मात्र दो मंदिर ही मिलेगे। यही वजह है कि यहां बारहों महीनों भक्तों का तांता लगा रहता है। बिन्ध्याचल व वैष्णोंधाम जाने वाले भी यहां मां के दर पर मत्था टेक आगे की यात्रा शुरू करते है। कहते हैं कि दक्षिण मुखी देवी के दरबार में जहां हमेशा दीपक की ज्योति जलती रहती है वहीं यह ऐसा स्थान है जहां भक्तों की आशा की ज्योति भी नहीं बुझती। बस जरूरत है कि दिल से मां का ध्यान करने की।
हम बात कर रहे हैं नगर के मुख्य चौक पर स्थित दक्षिण मुखी देवी दुर्गा के मंदिर की जहां बारहों महीने श्रद्धालुओं का शीश झुकता है। दक्षिण एशिया में मात्र दो दक्षिण मुखी देवी का मंदिर होने से इसकी महत्ता और बढ़ जाती है। प्रतिदिन मां का श्रृंगार होता है और दिन भर पूजन-अर्चन का सिलसिला चलता रहता है। मन्नत पूरी होने पर भक्त भी का श्रृंगार कराते हैं। बताते हैं कि वर्तमान समय में जहां शहर का मुख्य चौक है, वहां पांच सौ वर्ष पूर्व जंगल और झाडियां हुआ करती थीं। थोड़ी ही दूरी पर तमसा नदी बहती थी। इस मंदिर से लगभग दो सौ मीटर की दूरी पर तमसा नदी के तट पर रामघाट आज भी स्थित है। त्रेता युग में वन गमन के समय रामघाट पर भगवान श्रीराम ने देवी सीता और लक्ष्मण जी के साथ विश्राम किया था। भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग आज भी रामघाट पर स्थित है।
पांच सौ वर्ष पूर्व जब मंदिर के स्थान पर मात्र जंगल था और तमसा नदी करीब से बहती थी तो यहां बालू का टीला हुआ करता था। तभी निजामाबाद के शाहपुर गांव निवासी भैरो जी तिवारी ने उक्त स्थान पर तप किया था। जब उन्होंने बालू को हटाकर समतल बनाने का प्रयास किया तो उन्हें वहां एक काला पत्थर नजर आया और जब खुदाई करके देखा तो वह देवी दुर्गा की प्रतिमा थी। प्रतिमा में चार भुजाएं थीं। प्रतिमा काले पत्थर की बनी हुई थी। देवी जी की प्रतिमा मिलते ही वहां हजारों श्रद्धालु पूजन अर्चन के लिए जुट गये और तब से आज तक उक्त स्थान पर हर दिन पूजन-अर्चन होता है। स्वयं प्रकट हुई प्रतिमा की एक विशेषता यह भी है कि इसका मुख दक्षिण दिशा में है जबकि भारत ही नहीं दक्षिण एशिया में केवल कोलकता प्रान्त में देवी दक्षिणेश्वरी का मंदिर है जिसकी प्रतिमा का मुख दक्षिण दिशा में है।
काली जी के बारे में कहा जाता है कि नेपाल के काठमांडू में दक्षिण मुखी प्रतिमा है लेकिन वह काली जी की प्रतिमा है जिन्हें दक्षिणेश्वरी काली जी के नाम से जाना जाता है। मां दुर्गा के बारे में जानकार यही बताते हैं कि दक्षिण मुखी मंदिर दो ही है। एक तो आजमगढ़ तथा दूसरा कोलकाता में है। भैरो जी तिवारी आजीवन दक्षिण मुखी देवी का पूजन-अर्चन करते रहे। इसी परिवार के दयाल जी तिवारी ने भी अपना जीवन मां की सेवा में लगा दिया। लगभग सवा सौ साल पूर्व जब आजमगढ़ विकास की डगर पर चला तो दयाल जी तिवारी के परिवार के लोगों ने उक्त स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया। आज भी उन्हीं के परिवार के लोग पूजा-पाठ करते हैं। मान्यता है कि मां के दरबार से कभी कोई खाली नहीं लौटता। कोई भी महीना हो, यहां हमेशा श्रद्धालुओं का पहुंचना जारी रहता है।
Published on:
04 Oct 2019 07:16 pm
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