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आजादी के 76 साल बाद मिला शहीद को मिला सम्मान, अतरौलिया अस्पताल को मिला राजा जयलाल सिंह का नाम

देश की आजादी के 1858 में हंसते हुए फांसी पर चढ़े राजा जयलाल सिंह को आजादी के 76 साल बाद सरकार ने सम्मान दिया है। सरकार ने अतरौलिया के अस्पताल का नाम शहीद राजा जयलाल सिंह संयुक्त जिला चिकित्सालय कर दिया है। राजा जयलाल सिंह और उनके भाईयों ने 1857 की क्रांति में अपना सबकुछ खो दिया था लेकिन उन्होंने मरना पसंद किया लेकिन अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके।

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अतरौलिया स्थित अस्पातल

अतरौलिया स्थित अस्पातल

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
आजमगढ़. सरकार ने अमर शहीदों को सम्मान देने के क्रम में अतरौलिया के सौ शैय्या संयुक्त जिला चिकित्सालय को अमर शहीद राजा जयलाल सिंह का नाम दिया है। आजादी के 76 साल बाद ही सही लेकिन इसे सरकार का बड़ा फैसला माना जा रहा है। कारण कि 1857 की क्रांति में राजा जयलाल सिंह के परिवार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जयलाल सिंह को लखनऊ में इमली चौराहेे पर फांसी पर लटका दिया गया था। उनके बवंडरा किलों को अंग्रेजों ने पूरी तरह तबाह कर दिया था लेकिन उनके भाइयों ने अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके बल्कि कुंवर सिंह के साथ मिलकर लंबी लड़ाई। सरकार के फैसले से जयलाल सिंह के वंशज ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के लोग खुश हैं।

बता दें कि 1771 से 1801 तक आजमगढ़ अवध के नवाब के शासन में था। 10 नवम्बर 1801 में आजमगढ़ अंग्रेजी हुकूमत के अधीन चला गया। 1834 में आजमगढ़ जिला बना। 1836 में टामसन जिले के पहले कलेक्टर नियुक्त किये गये। 1857 में नवाब वाजिद अली शाह की गिरफ्तारी के बाद सूबे में क्रान्ति की आग भड़की जिसका सीधा प्रभाव आजमगढ़ पर पड़ा था, क्योंकि तत्कालीन अवध राज्य की सत्ता की बागडोर जिन तीन व्यक्तियों के हाथ में थी वे आजमगढ़ के ही थे। इसमें राजा जयलाल सिंह लखनऊ नगर के समाहर्ता कलेक्टर थे। इनके मझले भाई राजा बेनी माधव सिंह पूर्वी इलाके के सूबेदार तथा अवध सेना के सिपहसलार-ए-आजम थे जबकि इनके सबसे छोटे भाई फतेह बहादुर सिंह नसरते जंग अवध सेना के कमांडर थे। नवाब की गिरफ्तारी के बाद बेनी माधव सिंह ने नवाब के पुत्र बिरजिश कद्र को अवध का नवाब घोषित कर महारानी विक्टोरिया से मिलने के लिए भेज दिया। अवध सल्तनत का अस्त्र-शस्त्र, गोला-बारूद, गाल-असबाब लाकर अपने पैतृक रियासत पलास के जंगलों से घिरे अतरौलिया के बवंडरा में छिपाकर रख दिया। साथ ही अवध की फौजी गारद के साथ लखनऊ से लेकर बिहार एवं मध्य प्रदेश के विद्रोहियों को एकत्रित कर सशस्त्र संगठन तैयार किया।

उन्होंने आजमगढ़ शहर के निकट अट्ठैसी के विशेन राजपूतों, हीरा पट्टी के ठाकुर परगट सिंह, परदहां के ठाकुर जालिम सिंह, अजमतगढ़ के गोगा व भीखा साव तथा दुबारी, भगतपुर, नैनीजोर, रुदरी, बम्हौर, मोहब्बतपुर, बगहीडाड़ के क्रान्तिकारियों को संगठन में शामिल किया। इसके बाद कंपनी बाग में तैनात देशी पलटन के 500 सैनिकों के साथ विद्रोहियों ने बड़ी लड़ाई लड़ते हुए 3 जून 1857 को आजमगढ़ को आजाद कराया। इस संघर्ष में लेफ्टिनेंट हचकिंसन व कर्नल डेविस मारे गये थे। 4 जून को विपल्वी सैनिक सरदार बन्धु सिंह के नेतृत्व में फैजाबाद रवाना हो गये। वहां पर भाग रहे अंग्रेजों को घाघरा नदी में बेगमगंज के निकट मौत के घाट उतार दिया और कानपुर के विद्रोहियों की मदद के लिए चल दिये। इसके बाद माहुल में राजा इशरत जहां, तिघरा में पृथ्वी पाल सिंह तथा अतरौलिया में राजा फतेह बहादुर सिंह ने अपना अधिकार कर लिया।

इसके बाद 26 जून 1857 को अंग्रेजी अफसर बेनी बुल्स ने बवंडरा किले की घेराबंदी की। बेनी माधव सिंह की विपल्वी सेना से अंग्रेज परास्त होकर भाग खड़े हुए। राजा की सेना ने अंग्रेजों का पीछा किया। बेनी बुल्स की हार की जानकारी बनारस और इलाहाबाद पहुंची तो भारी संख्या में ब्रिटिश फौज आजमगढ़ भेजी गयी। अंग्रेजी सेना अतरौलिया पहुंचती कि इससे पहले ही कोयलसा में फिर मुठभेड़ हुई और अंग्रेज पुनः परास्त हुए। मैदान छोड़कर भाग रहे अंग्रेज सेना पर विपल्वी सेना ने कप्तानगंज और सेहदां में पुनः आक्रमण कर गोला-बारूद व रसद छीन लिया तथा स्वतंत्रता का हरा झंडा फहरा दिया। 3 सितम्बर 1857 को आजमगढ़ पर पुनः अंग्रेजों का अधिकार हो गया। 20 सितम्बर 1857 को मंदुरी में धोखे से आक्रमण कर अंग्रेजों ने विपल्वी सेना को भारी नुकसान पहुंचाया।

अंग्रेजी सेना ने प्रतिशोध स्वरूप बवंडरा किले को ध्वस्त कर दिया। तिघरा व माहुल के किले को ध्वस्त कर लूटपाट की। पृथ्वी पाल सिंह ने आत्मसमर्पण कर दिया लेकिन ठाकुर परगट सिंह ने महराजगंज थाने पर कब्जा कर लिया। इसके बाद बेनी माधव सिंह व कुंवर सिंह की सेना ने भोजपुर में अंग्रेजी सेना से युद्ध लड़ा और जीत हासिल की। 23 जून 1858 को राजा फतेह बहादुर सिंह फैजाबाद में महीरपुर कोट के निकट अंग्रेजों से युद्ध करते हुए शहीद हो गये। राजा जयलाल सिंह को लखनऊ में फांसी पर लटका दिया गया। राजा बेनी माधव सिंह फरारी का जीवन व्यतीत करते हुए 1874 में नेपाल भाग गये। 16 साल की फरारी के बाद बेनी माधव सिंह अयोध्या लौटे और आवास बनवाकर वहीं रहने लगे। लगभग 10 साल बाद वह बवंडरा आ गये। वर्ष 1903 में इनका निधन हो गया लेकिन आजादी के बाद इस परिवार को भुला दिया गया। कई बार शहीद स्मारक बनाने की मांग उठी लेकिन सरकारों ने ध्यान नहीं दिया।

अब आजादी के 75 साल बाद सरकार ने अतरौलिया अस्पताल का नाम राजा जयलाल सिंह के नाम पर रखकर शहीद को सम्मान दिया है। इससे लोग खुश हैं। राजा जयलाल सिंह के वंशज राजा राजेंद्र प्रताप सिंह तथा उनके पुत्र कुंवर ऋषभ सिंह ने बताया कि अमर शहीदों के सम्मान के लिए काफी दिनों से प्रयास चल रहा था। देर से ही सही लेकिन सरकार के फैसले से वे संतुष्ट हैं। बता दें कि पिछले दिनों सांसद अनुप्रिया पटेल व कैबिनेट मंत्री आशीष पटेल ने आजादी की लड़ानी लड़ने वाले इस परिवार को सम्मान दिलाने का वादा किया था। उन्हीं के प्रयास से सरकार ने राजा जयलाल सिंह के नाम रखने का फैसला लिया।