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पश्चिमी यूपी की फिजाओं में फैलने लगी गुड़ की खुशबू, विदेश तक है यहां के गुड़ की धाक

इस समय पश्चिमी यूपी की फिजाओं में स्वादिष्ट गुड़ की खुशबू फैल रही है। बता दे कि पूरे पश्चिमी यूपी गन्ने की बेल्ट मानी जाती है और यहां के गुड़ की धाक विदेशों तक में है। गुड़ खाने में जितना स्वादिष्ट होता है उससे अधिक उसकी मन मोहने वाली खुशबू होती है। इसे बनाते समय यह खुशबू दूर तक फैलकर अपनी मिठास का अहसास करा देती है।

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बागपत. उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में हर तरफ तो फिलहाल यहीं माहौल है। चारों ओर गन्ने के कोल्हू, क्रेशर चलने से गुड़ की मीठी खुशबू फैलनी शुरू हो गई है। मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, हापुड़, बड़ौत आदि स्थानों पर क्रेशर लगाकर गुड़, शक्कर, रवा आदि बनाना शुरू कर दिया गया है।

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देवोत्थान पर गन्ने की पूजा के बाद रस पीने का चलत

बता दे कि देव जागने के समय यानी देवोत्थान एकादशी वाले दिन गन्ने से देवताओं की पूजा अर्चना करने के बाद गन्ना खाने व रस पीने आदि का चलन है। लेकिन पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ने की पैदावार अधिक होने के चलते देवोत्थान से पूर्व ही क्रेशर, कोल्हू व गन्ना क्रय केंद्र शुरू हो जाते हैं। बता दे कि जिले की चीनी मिलें भी शुरू हो चुकी हैं और इनकी चिमनियों से धुंआ निकलना शुरू हो चुका है।

बागपत जिले के अलावा अन्य जनपदों की चीनी मिलों के क्रय केंद्र भी शुरू हो चुके हैं। मिलों ने तेजी से गन्ने की खरीद शुरू कर दी गई है। जिले में आसपास के क्षेत्रों से आए गुड़ कारीगरों द्वारा किराये पर कोल्हू व क्रेशर लेकर गुड़-शक्कर बनाने का काम शुरू कर दिया गया है। क्रेशर पर दो सौ से ढाई सौ रुपए प्रति कुंतल के भाव से गन्ने की खरीद की जा रही है। जबकि गन्ना क्रय केंद्रों पर तीन सौ पचास रुपए प्रति कुंतल गन्ने की खरीद की जा रही है। इसके बाद भी क्रेशरों पर भारी मात्रा में गन्ना पहुंच रहा है।

मई तक चलते हैं क्रेशर

दीपावली के दौरान शुरू हुए क्रेशर मई के पहले या फिर दूसरे सप्ताह तक चलते हैं। गांवों के लोग चीनी के उपयोग से बचते हुए गुड़, शक्कर, रवा खाना अधिक पसंद करते हैं। गुड़ की कतरी तिल, मूंगफली, घी, सौंठ आदि डलवा कर बनवाने के बाद बड़े स्वाद से खाते हैं। ग्रामीण गुड़ को ही मिठाई मानते हैं।

लोगों का यह भी मानना है कि गुड़ खाने से शरीर स्वस्थ रहता है। बीमारियों से बचाव होता है। क्षेत्र के किसानों का गन्ना जब क्रय केंद्रों पर नहीं खरीदा जाता है। क्रेशर संचालकों का कहना है कि छह माह का रोजगार उन्हें क्रेशर पर गुड़ बनाने से मिल जाता है जिससे उनका पूरे साल का खर्च चलता है।

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