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आन्दोलन की राह पर किसान, मंदिर माफी नोट को लेकर फिर हुए उग्र

झोटवाड़ा पंचायत समिति का घेराव कर राजस्व शिविर का किया बहिष्कार

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बगरू

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Teekam Saini

Jun 11, 2018

Farmers on the path of movement

आन्दोलन की राह पर किसान, मंदिर माफी नोट को लेकर फिर हुए उग्र

कालवाड़ (जयपुर) . झोटवाड़ा पंचायत समिति मुख्यालय पर सोमवार को आयोजित राजस्व लोक अदालत न्याय आपके द्वार शिविर का एक बार फिर सरनाडूंगर पंचायत क्षेत्र की काश्त भूमि पर मंदिर माफी नोट से आक्रोशित किसानों ने रैली निकाल कर प्रदर्शन कर बहिष्कार किया। पंचायत समिति सदस्य हेमराज सैन ने बताया कि सरनाडूंगर, चक सरनाडूंगर, बांसड़ी व चक बासड़ी के तीन सौ से अधिक किसानों की काश्त भूमि पर वर्ष 2005 में राजस्व विभाग द्वारा मंदिर माफी का नोट लगाने के बाद राज्य सरकार की किसी भी योजना का लाभ नहीं मिलने व बैंकों से केसीसी नहीं मिलने से काश्तकार परेशानी का सामना कर रहे हैं। राज्य सरकार व जिला प्रशासन द्वारा नियमानुसार नोट नहीं हटाए जाने से किसान परिवार मानसिक तनाव में है। 8 जून को सरनाडूंगर पंचायत में आयोजित राजस्व शिविर का बहिष्कार करने के बाद से किसान आन्दोलन की राह पर हैं। सोमवार सुबह मंदिर माफी नोट को हटाने की मांग को लेकर सरनाडूंगर में किसानों ने सभा आयोजित की और वहां वाहनों की रैली के साथ झोटवाड़ा पंचायत समिति में आयोजित मेगा राजस्व शिविर में पहुंचे और नारेबाजी कर प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन कर धरने पर बैठ गए।
अधिकारियों से मिली किसान समिति, नहीं निकला हल
मंदिर माफी नोट से पीडि़त किसानों ने आरोप लगाया जयपुर के एडीएम द्वितीय के पास किसानों का प्रकरण विचाराधीन होने के बावजूद यह रेफरेंस नोट नहीं हटाया जा रहा। किसानों के विरोध व प्रदर्शन को देखते हुए अधिकारियों ने शांति व्यवस्था लिए झोटवाड़ा पुलिस को मौके पर बुलाया और एसडीएम आशीष वर्मा ने किसानों सेे समझाइस की। शिविर स्थल पर ही 11 किसानों की गठित एक समिति जयपुर एसडीएम के साथ कलक्ट्रेट पहुंची और एडीएम सुनील भाटी से मुलाकात कर पीड़ा व्यक्त की, लेकिन किसानों को एडीएम की तरफ से कोई सन्तोषप्रद जवाब नहीं मिला।
13 साल से भुगत रहे परेशानी
सरनाडूंगर पंचायत क्षेत्र के गांवों के किसान अपनी काश्त भूमि पर जयपुर के रामगंज स्थित एक मंदिर के नाम मंदिर माफी का नोट लगने के बाद पिछले 13 साल से परेशानी भुगत रहे हैं। किसानों की पीड़ा अब तक किसी सरकार ने नहीं सुनी। ऐसे में किसानों के पास आन्दोलन के अलावा न्याय के लिए कोई चारा नहीं बचा है।