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घोटा-दड़ी के साथ चंग-ढप बिसरे, सोशल मीडिया पर हैप्पी होली

प्रेम व भाईचारा ही था मकसद, तीन दिन तक रहता था उल्लास

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बगरू

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Kashyap Avasthi

Mar 20, 2019

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घोटा-दड़ी के साथ चंग-ढप बिसरे, सोशल मीडिया पर हैप्पी होली

कालवाड़. आधुनिक दौर में होली जैसे महापर्व की परम्पराओं में भी बदलाव आता जा रहा है। क्षेत्र के गांवों में अब होली का उल्लास पहले जैसा नहीं रहा, बड़े बुजुर्गां की कमी एवं मोबाइल, टीवी क्रान्ति में परम्पराएं बिसरे दिनों की बात होती जा रही हैं। भले ही शेखावाटी क्षेत्र में आज भी होली पर्व पर चंग व ढप के साथ नृत्य व गानों का उल्लास रहता है लेकिन जयपुर शहर के पास स्थित कालवाड़, हिंगोनियां, बेगस, खोराबीसल, हाथोज, करधनी, भैंसावा आदि ऐसे दर्जनों गांव हैं, जहां अब ढप-चंग की थाप कम सुनाई देती है और लोग परम्परानुसार होलिका दहन कर त्योहार की इतिश्री कर लेते हैं। नई पीढ़ी अब सोशल मीडिया पर त्योहार मना रहे हैं।

मंद पड़े होली के गीत
अब होली के गीतों की परंपरा भी मंद पड़ चुकी है। होली के दिन ही दहन के वक्त गीत गाए जाते हैं। पहले होली के त्यौंहार से पूर्व गांवों में लोग घोटा दड़ी खेला करते थे। इसके खेल का आयोजन चांदनी रात की रौशनी में होता था। घोटा दड़ी आधुनिक हॉकी का ही पुराना रूप है, इसके लिए स्टीक के लिए खेजड़ी व बबूल की लकड़ी से घोटा (स्टीक) बनाकर रद्दी कपड़ों की वॉलीबाल की तरह बॉल बनाते थे और फिर दोनों टीमें एक दूसरी साइड में गेंद को घोटे से धकेल कर एक दूसरे के मौहल्ले में ले जाकर गोल करते थे। रात 11 से 12 तक इस खेल का आयोजन होता था लेकिन अब यह खेल बंद हो चुका है।


जब बाजारों में धुलण्डी पर निकलती थी सनेती

बगरू. रंगों से सराबोर होली का त्यौहार यूं तो हर जगह अपनी अलग ही छाप छोड़ता है, लेकिन बगरू पिं्रट के नाम से विश्वविख्यात बगरू कस्बे में होली की धमाल निराली थी। अब समय भले ही बदल गया है, लेकिन होली की पुरानी यादें हमारे जेहन में अब भी ताजा हैं। पत्रिका ने जब कुछ बुजुर्गों से पुरानी यादें ताजा की।

बुजुर्ग धनश्याम झालानी ने बताया कि जहां तक याद है, वर्ष 1960 से बगरू में हर धुलण्डी पर सनेती निकाली जाती थी। करीब तीन दशक तक मैं खुद इसमें शामिल हुआ। बगरू के लक्ष्मीनाथ चौक, जुगल बाजार, रघुनाथ चौक तक इस सनेती को ग्रामीण कंधे पर उठाते हुए गुजरते थे। गांव के विभिन्न लोग इसमें शामिल होते थे। इस दौरान गांव के अनेक लोग बीच बीच में चीखते हुए दु:ख जताते थे कि जो अब चले गए वह बहुत अच्छे आदमी थे। हमारा तो साथी चला गया।

जीवित व्यक्ति को सनेती के रूप में निकालते समय लोगों के बीच सिर्फ त्यौहार का उल्लास बरकरार रखना ही मकसद था। यह सिलसिला करीब 3 दशक तक चला। ऐसे में रंगों के त्यौहार कभी बदरंग नहीं हुआ। इस दौरान अधिकतर लोग स्वत: ही घरों से बाहर निकलकर सनेती के उल्लास में शामिल होते और जो कुछ लोग घर से बाहर आने में आनाकानी करते तो उन्हें जोर-आजमाइश कर बाजारों में ले आते थे।