
कालवाड़ (जयपुर). कश्मीर की ठंडी वादियों में खिलने वाली उम्दा किस्म की केसर की खुशबू अब कालवाड़ के आसपास के गांवों में भी महक रही है। बसेड़ी गांव में एक किसान ने प्रतिकूल वातावरण में केसर फसल को उत्पादित कर खेती में नवाचार का उदाहरण पेश किया है। गौरतलब है कि इससे पहले भी इसी गांव के दर्जनों किसान जयपुर जिले में ही नहीं पूरे राज्य में इजरायली पद्धति से सब्जी व अन्य फसलों का पॉली हाउस में उत्पादन कर राष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन कर चुके हैं। अब इसी गांव एक प्रगतिशील किसान ने आठ माह के प्रयास के बाद कश्मीरी केसर का उत्पादन करने में सफलता हासिल की है। अमूमन कश्मीर व अन्य ठंडे प्रदेशों में उगने वाली बेशकीमती केसर की खेती को बसेड़ी गांव निवासी भोलूराम व हीरा देवी बिजारणियां ने घर के पास खेत को तैयार कर एकदम नम बनाया और गत वर्ष अगस्त में 100 बीज खरीद कर पौध तैयार की। जनवरी में पौधों पर केसरिया फूल खिलने के साथ इसकी सुगंध से खेत महक उठा। केसर के सौ पौधों में से 10 पौधे खराब हो गए और 90 पौधे सुरक्षित तैयार हुए।
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तुड़ाई शुरु, दो किलो केसर तैयार
किसान भोलूराम ने बताया कि पौधों पर केसर के फूल लगने के बाद पकाई के साथ सुरक्षित तुड़ाई की। अब तक किसान इससे करीब दो किलो केसर प्राप्त चुका है और भी केसर तैयार होने की संभावना है। केसर के बाजार भाव करीब डेढ़ लाख रुपए किलो से भी ज्यादा तक के होने से किसान को तीन लाख रुपए तक केसर से आमदनी होने की संभावना है। बाजार में केसर ग्राम के हिसाब से बिकती है।
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केसर को माना जाता लाल सोना
केसर के बेशकीमती होने से इसे लाल सोना भी कहा जाता है। अब बसेड़ी सहित आस पास के गांवों के प्रगतिशील किसान इस लाल सोने की फसल के प्रति जागरुक होकर इसके उत्पादन में जुटे है। किसान बोदूराम निठारवाल ने बताया कि केसर की खेती अब किसानों को आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करने के लिए कारगर सिद्ध होगी।
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परखकर खरीदें बीज
प्रदेशभर में इन दिनों कुछ दुकानदार अमेरिकन केसर के नाम से कुसुम के बीज बेच रहे हैं। ऐसे में केसर के बीज खरीदने में सावधान बरतें। किसान कई-कई माह तक कुसुम के पौधों को पाल-पोस कर बड़ा करता है और जब इसके फूलों के पराग को बाजार बेचने जाता है तो वह ठगा सा महसूस करता है। कुसुम (सेफ्लॉवर) का वैज्ञानिक नाम कारथेमस टिंकटोरियस है। केसर के बीज खरदते समय कृषि अधिकारी की मदद ली जा सकती है।
Published on:
09 Apr 2018 08:27 pm
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