
अटूट आस्था का केन्द्र है बाबा कोटेश्वर धाम
बालाघाट. मप्र, छग और महाराष्ट्र राज्य की सीमा और बालाघाट जिले के अंतिम छोर पर बसे लांजी में स्थित बाबा कोटेश्वर धाम श्रद्धालुओं के अटूट आस्था का केन्द्र बना हुआ है। कोटेश्वर धाम पुरातात्विक धरोहर के रुप में धार्मिक पौराणिक महत्व का तीर्थ है, जो 108 उपलिंगों में शामिल है। यहां वर्षभर मेले जैसा माहौल रहता है। लेकिन सावन माह में लगने वाला मेला कुछ खास होता है। यहां सावन माह शुरु होते ही कोटेश्वर महादेव में कांवडि़ए जल चढ़ाते है। वर्ष 1900 में अस्तित्व में आए इस मंदिर का निर्माण ब्रिटिश शासनकाल में तत्कालीन तहसीलदार रामप्रसाद दुबे ने कराया था। तब से आज तक यह मंदिर क्षेत्रवासियों सहित मप्र, छग और महाराष्ट्र राज्य के श्रद्धालुओं के लिए अटूट आस्था का केन्द्र बना हुआ है।
मंदिर में है कल्चुरी कालीन कलाकृतियां
बाबा कोटेश्वर धाम में कल्चुरी कालीन कलाकृतियां है। इस मंदिर का उल्लेख इतिहास में भी दर्ज है। वैसे तो यह मंदिर 1800 ईसवी में अस्तित्व में आया है। जिसके बरामदे का निर्माण 1902 में ब्रिटिश शासन काल में तत्कालीन तहसीलदार रामप्रसाद दुबे की निगरानी में हुआ था। यहां मांगी जाने वाली हर मुराद पुरी होने से यह मान्यता का तीर्थ हो गया है। यहां श्मशान होने व प्राचीन नरसिंह मंदिर होने से यह तंत्र-मंत्र की साधना करने वाले साधकों के लिए खास है। यहां दधिचि ऋ षि के तप करने का भी उल्लेख मिलता है। यह उनकी तपोभूमि भी रही है।
एक पखवाड़े पूर्व से शुरू हो जाती है सावन की तैयारियां
वैसे तो कोटेश्वर धाम में वर्ष भी श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लेकिन 108 उपलिंगों में शामिल होने की वजह से सावन माह में यहां श्रद्धालुओं की खासी भीड़ रहती है। इधर, श्रद्धालुओं द्वारा सावन माह शुरू होने के एक पखवाड़े पहले से ही मंदिर में पूजा व भक्तों के लिए खास इंतजाम करने का काम शुरू कर देते हैं। स्थानीय लोग निष्ठापूर्वक मंदिर में देखरेख करते हैं। मंदिर में सावन के मेले के दौरान जमा होने वाली श्रद्घालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने का ध्यान रखा जाता है। इसके साथ कतार में लोगों को एक-एक कर मंदिर तक पहुंचाया जाता है।
Published on:
19 Jul 2022 10:27 pm
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