
ढिंगरी मशरूम उत्पादन से आय करें दोगुनी
किरनापुर। राणा हनुमान सिंह कृषि विज्ञान केन्द्र बडग़ांव किरनापुर में भारतीय कृषि कौशल परिषद् के द्वारा मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत जिले के 20 प्रशिक्षार्थियों को मशरूम उत्पादन और मशरूम से निर्मित होने वाले व्यवसायिक उत्पादों के विषय पर तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा हैं। यह कार्यक्रम 1 जनवरी से 29 जनवरी तक चलाया जाएगा। कार्यक्रम में केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. आरएल राऊत द्वारा बताया गया कि आज विश्व में मशरूम की 2000 के करीब प्रजातियां पाई जाती हैं, जबकि भारत में 200 प्रजातियां ही खाने के लिए उपयुक्त हैं। आज हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या के लिए पौष्टिक भोजन की आवश्यकता हैं। मशरूम का पौष्टिक आहार के रूप में विशेष स्थान हैं। प्रशिक्षक प्रभारी डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने बताया कि ढिंगरी मशरूम जिसका वैज्ञानिक नाम प्लूरोटस है। यह आकार में सीपीनुमा या एक बड़े चम्मच या प्लेट की तरह होती है, जिसे 'छत्रक' कहते हैं। ढिंगरी की विभिन्न प्रजातियों में छत्रक विभिन्न रंगों का होता है। जैसे सफेद, भूरा, पीला, गुलाबी, कत्थई इत्यादि। ढिंगरी मशरूम को किसी भी प्रकार के कृषि अवशिष्टों पर आसानी से उगाया जा सकता है और इसका फसल चक्र 35-50 दिन का होता है।
ढिंगरी की कई प्रचलित जातियों का विश्व में व्यावसायिक उत्पादन हो रहा है, जिनमें प्लूरोटस सेपीडस, प्लूरोटस फ्लेबीलेटस, प्लूरोटस सजोर-काजू, प्लूरोटस फ्लोरिडा, प्लूरोटस साईट्रिनोपीलीएटस, प्लूरोटस ऑस्ट्रीएटस इत्यादि। इसके अतिरिक्त बताया कि आज ढिंगरी वार्षिक उत्पादन के आधार पर विश्व में तीसरे स्थान पर है और इसकी पैदावार मुख्यत: चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, इटली, ताईवान, थाईलैंड और फिलीपीन्स में हो रहा है। हमारे देश में इसका उत्पादन मुख्यत: आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मप्र, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, मेघालय, मणीपुर, आसाम राज्यों में हो रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. एसआर धुवारे, डॉ. एके गिरी, डॉ. एसके जाटव, मौसम वैज्ञानिक धमेन्द्र अगासे, कार्यक्रम सहायक डॉ. मुरलीधर इंगले और एसएल वास्केल एवं एग्रोमेट आब्र्जवर जितेन्द्र नगपुरे ने प्रशिक्षण को सफल बनाने में अपने-अपने योगदान दिया।
Published on:
11 Jan 2020 05:29 pm
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