scriptProblem-तीन माह गांव में कैद, मुफलिसी में गुजार रहे जीवन | Problem-Imprisoned in the village for three months, living a life of poverty | Patrika News
बालाघाट

Problem-तीन माह गांव में कैद, मुफलिसी में गुजार रहे जीवन

गांव पहुंचने के लिए पक्की सडक़ नहीं। गांव में बिजली तो पहुंची हैं, लेकिन खंभे शोपीस बने हुए हैं। बिजली कब गुल और बहाल होती है, इसका कोई समय नहीं। विडम्बना यह है कि बारिश के दिनों में ग्रामीणों को गांव में ही कैद रहना पड़ता है। अतिआवश्यक होने पर अपनी जान जोखिम में डालकर […]

बालाघाटJun 30, 2024 / 10:06 pm

Bhaneshwar sakure

समस्या

जंगलों के बीच बसा वन ग्राम टिकरिया।

गांव पहुंचने के लिए पक्की सडक़ नहीं। गांव में बिजली तो पहुंची हैं, लेकिन खंभे शोपीस बने हुए हैं। बिजली कब गुल और बहाल होती है, इसका कोई समय नहीं। विडम्बना यह है कि बारिश के दिनों में ग्रामीणों को गांव में ही कैद रहना पड़ता है। अतिआवश्यक होने पर अपनी जान जोखिम में डालकर आवागमन करना पड़ता है।
बालाघाट. गांव पहुंचने के लिए पक्की सडक़ नहीं। गांव में बिजली तो पहुंची हैं, लेकिन खंभे शोपीस बने हुए हैं। बिजली कब गुल और बहाल होती है, इसका कोई समय नहीं। विडम्बना यह है कि बारिश के दिनों में ग्रामीणों को गांव में ही कैद रहना पड़ता है। अतिआवश्यक होने पर अपनी जान जोखिम में डालकर आवागमन करना पड़ता है। दरअसल, गांव पहुंचने के लिए बीच में नेहरा नदी बाधक बनी हुई है। नेहरा नदी में अभी तक पुल नहीं बन पाया है। यह समस्या वर्षों से बनी हुई है। लेकिन इसका अभी तक समाधान नहीं हो पाया है। समस्याओं के बीच अपना जीवन-यापन करना बैगा आदिवासियों की मजबूरी बनी हुई है। मामला जिले के परसवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के वनग्राम टिकरिया का है।
परसवाड़ा विधान सभा क्षेत्र के जनपद पंचायत परसवाड़ा के अंतर्गत ग्राम पंचायत बडग़ांव का वन ग्राम जंगलों व पहाडिय़ों के बीच बसा हुआ है। इस ग्राम की आबादी ज्यादा नहीं है, लेकिन यहां पर करीब 36 बैगा आदिवासी परिवार निवास करते हैं। यहां की कुल आबादी करीब 150 के आसपास है। ग्रामीणों के सभी प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मसलन बिजली, पानी, सडक़, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी समस्याएं शामिल है। बावजूद इसके इन समस्याओं का अभी तक निराकरण नहीं हो पाया है।
उल्लेखनीय है कि जनपद पंचायत परसवाड़ा के बडग़ांव पंचायत की दूरी 30 किलो मीटर है। जबकि शेरवी पंचायत टिकरिया से 14 किलोमीटर दूर है। समस्त ग्रामीण चरेगांव का बाजार हॉट करते हंै। स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए भी चरेगांव ही जाना पड़ता है। वन ग्राम भी चरेगाव सर्किल में ही आता है।
नेहरा नदी पर नहीं बन पाया पुल
चरेगांव मुख्यालय से वन ग्राम टिकरिया करीब 13 किमी दूर घने जंगलों के बीच बसा हुआ है। रास्ते में नेहरा नदी पड़ती है। जहां गर्मी के दिनों को छोडकऱ सभी समय पानी बहते रहता है। जिसके कारण ग्रामीणों को आवागमन में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बारिश के दिनों में ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर अपने गंतव्य स्थल तक पहुंचना पड़ता है। अधिक बारिश होने पर ग्रामीण गांव में ही कैद हो जाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार करीब 3 माह वे अपने ही गांव में कैद रहते हैं।
जंगल से होकर गुजरता है कच्चा रास्ता
गांव पहुंचने के लिए पक्की सडक़ नहीं है। कच्चे रास्ते से ही ग्रामीणों को आवागमन करना पड़ता है। यह कच्चा रास्ता अनेक स्थानों से उबड़-खाबड़ भी है। ज्यादातर कच्चा मार्ग जंगलों से होकर गुजरता है। जिसके कारण ग्रामीणों को आवागमन करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पक्की सडक़ और नेहरा नदी में पुल नहीं होने की वजह से जनप्रतिनिधि, अधिकारी भी गांव नहीं पहुंच पाते हैं। जिससे उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है।
शोपीस बने बिजली के खंभे
वन ग्राम टिकरिया में ग्रामीणों को बिजली की सुविधा मुहैया कराई गई है। लेकिन बिजली के खंभे गांव की शोभा बढ़ा रहे हैं। बिजली कब गुल हो जाए इसका कोई समय नहीं होता। इतना ही नहीं बिजली के बहाल होने का भी कोई समय नहीं रहता है। खासतौर पर रात्रि के समय बिजली नहीं होने से जंगली जानवरों, जहरीले जीव जंतुओं का भय बना रहता है। मौजूदा समय में गांव तक पहुंचाई गए बिजली के खंभे, तार जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो गए हैं।
नहीं मिल पाती स्वास्थ्य सुविधा
ग्रामीणों को स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। स्वास्थ्य खराब होने पर मरीजों को बैल गाड़ी से 13 किमी दूर चरेगांव या फिर 25 किमी दूर परसवाड़ा ले जाना पड़ता है। या फिर झोलाछाप डॉक्टरों से उपचार कराना पड़ता है। झोलाछाप डॉक्टर भी उपलब्ध नहीं होने पर जड़ी-बुटी या देशी पद्धति से गांव में ही वे अपना उपचार करते हैं।
इनका कहना है
नेहरा नदी पर अभी तक पुल नहीं बन पाया। बारिश के दिनों में ग्रामीण अपने ही गांव में कैद हो जाते हैं। गांव पहुंचने के लिए कच्ची सडक़ से जंगलों से होकर करीब 13 किमी का सफर तय करना पड़ता है। यह समस्या वर्षों से बनी है लेकिन समाधान अभी तक नहीं हो पाया है।
-दिलीप टेकाम, ग्रामीण, टिकरिया
गांव में न सही ढंग से बिजली मिल पा रही है और न ही स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ। अधिकारी, जनप्रतिनिधि भी गांव नहीं पहुंच पाते हैं। सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण अपना जीवन जी रहे हैं। गांव में रोजगार के साधन भी नहीं है।
-खमेर सिंह, ग्रामीण, टिकरिया

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