
नींद छोटी मृत्यु और मृत्यु बड़ी नींद है - मुनिश्री
बालाघाट. दिव्य त्रिवेदी प्रतिष्ठा के तीसरे दिन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के परम शिष्य अजीत सागर, दयासागर, विवेकानंद सागर जी के सानिध्य में जिन-जिन पुण्यार्जकों द्वारा जिनेन्द्र भगवन की प्राण प्रतिष्ठित प्रतिमाओं को नवीन सोने की पॉलिश युक्त तीन वेदीयों में २ दिसम्बर को विराजित होगी। उन सभी प्रभु प्रतिमाओं की शोभायात्रा पांच रथो में विराजित कर महावीर भवन से निकाली गई। जो हनुमान चौक, कालीपुतली चौक से भ्रमण करते हुए महावीर भवन में पहुंच संपन्न हुई।
झांकियां रही आर्कषक
जगह-जगह जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमाओं व तीन मुनिवरों की आरती उतारी गई और पद प्रक्षालन का भव्य कार्यक्रम संगीतमय नृत्य गायन व भजन सहित बहुमंडल, बालिकामंडल, नवयुवक मंडल एवं तरूणसागर जागृति मंडल सहित अन्य मंडलों द्वारा किया गया। शोभायात्रा में जीवन झांकियां आर्कषक का केन्द्र रही। इस दौरान अजीतसागर महाराज ने महावीर भवन में अपने प्रवचन में कहा कि धर्म की प्रभावना नारों व समारोहों से नहीं वरन सच्चे आचरण से होती है। वन में अहिंसा के मूर्तिक प्रभु राम को देखकर राक्षस भी मानव बन अच्छे कर्म किए। परमात्मा को पाने के लिए परिग्रह का त्याग करना होगा। संतुलित संयम से ही समाज एवं परिवार चलता है। कर्ण सा दानी, हनुमान सा भक्त और सीता जैसी शीलवान नारियां बने। बार-बार वहीं खाना, पीना, जीना, नहाना, वहीं तृष्णा, चाह और आंकाक्षा इन सबका अंत नहीं। देखा जाए तो हमने भोग व वासना नहीं भोगे अपितु भोग व वासना ने हमें भोगा है।
तृष्णा के बारे में दी जानकारी
मुनिश्री ने कहा कि तृष्णा कभी कम नहीं होती बढ़ते जाती है और तृष्णा का बुढ़ापा नहीं आता जो हमारे रग-रग में भरी है। तृष्णा हाथ, आंख, नासिका, जिव्हा, पैरों में है। तृष्णा और लोभ का आवास कहां नहीं, इन सबकों छोडऩा ही धर्म है। जीवन में तृष्णा, लोभ, माया, मोह, राग, द्ववेष, ईष्र्या, भागा दौड़ी तभी तक है जब तक आंखे खुली है। आंख मूंदी और दुनिया खत्म है। नींद छोटी मृत्यु है और मृत्यु बड़ी नींद है। जीवन में मृत्यु का सतत् स्मरण तुम्हें पापों एवं वासनाओं से मुक्ति दिलाएंगी। उक्त आशय की जानकारी जिला संयोजक धर्म संरक्षक राकेश देवडिय़ा ने दी।
Published on:
01 Dec 2018 08:04 pm
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