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संग्रहालय में विद्मान हैं एक हजार साल पुरानी प्रतिमाएं

जिले की प्राचीन धरोहरों को संरक्षित किए संग्रहालय

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जिले की प्राचीन धरोहरों को संरक्षित किए संग्रहालय

जिले की प्राचीन धरोहरों को संरक्षित किए संग्रहालय

शहर के आंबेडकर चौराहे की शान बन चुका पुरातत्व शोध संग्रहालय कई मायनों में खास बना हुआ है। संग्रहालय में 12 वीं और 16 वीं शताब्दी की एक हजार साल पुरानी पाषण प्रतिमाओं के अलावा विलुप्त हो चुकी परंपराओं के प्रतीकात्मक स्वरूपों को संरक्षित किया गया है, ताकि नई पीढ़ी भी यहां पहुंचकर इनकों जान सकें। खासकर यहां स्थापित की गई 100 वर्ष पुरानी (छुकछुक) नेरोगेज ट्रेन की बोगी ने संग्रहालय के नाम को विश्व पटल पर अंकित किया है। प्रतिदिन यहां पर्यटक इनका अवलोकन और शोधार्थी शोध करने पहुंते हैं।

90 के दशक में किया गया निर्माण

संग्रहालय के अध्यक्ष डॉ वीरेन्द्र सिंह गहरवार के अनुसार जिले में पुरातत्व संपदाओं की भरमार है। विभिन्न तहसील क्षेत्रों में ये पुरा संपदाएं असंरक्षित बिखरी पड़ीं हैं। इन्हीं को एक छत के नीचे संरक्षित किए जाने सन् 1991-92 में इस संग्रहालय का निर्माण करवाया गया हैं। पुरातत्व प्रेमियों और शोधार्थियों की मदद से यहां काफी संख्या में पुरातत्व संपदाओं को संरक्षित किया जा चुका हैं। इन संपदाओं का अस्तित्व और मूल स्वरूप बना रहे इसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं।

यह है प्रमुख बहुमूल्य मूर्तियां

प्रथम तीर्थंकर (12वीं शताब्दी)
योद्धा नेवरगांव, लांजी (16वीं शताब्दी)
तीर्थंकरनाथ (16वीं शताब्दी)
महिला योद्धा नेवरगांव, लांजी (16वीं शताब्दी)
चतुर्भुज विष्णु, गरुड़ पर (12वीं शताब्दी)
गणेश प्रतिमा (12वीं शताब्दी)

शोध कार्य में मिलती है मदद

संग्रहाध्यक्ष डॉ गहरवार ने बताया कि पहले पुरातत्व पर्यटन को लेकर स्कूल कॉलेजों में सबजेक्ट नहीं हुआ करते थे। लेकिन अब पुरातत्व क्षेत्र में भी पीएचडी की जाने लगी है। पुरातत्व विद्यार्थी संग्रहालय में पहुंचकर अपने शोध कार्य को पूरा कर पाते हंैं। जिन्हें भटकना नहीं पड़ता है। नई पीढ़ी भी जिले के इतिहास और परंपराओं को जानने संग्रहालय पहुंचते हैं। एक छत के नीचे उन्हें महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हो पा रही है।

इन निर्माण कार्यो की दरकार

डॉ गहरवार के अनुसार पुरातत्व धरोहरों के लिहाज से वर्तमान में संग्रहालय भवन छोटा पडऩे लगा हैं। इस लिहाज से अब भी वृहद हॉल और कमरों की आवश्यकता महसूस होती है। वहीं भवन काफी कमजोर होने के कारण नए भवन की दरकार भी है। इसके लिए उन्होंने शासन स्तर पर पत्र व्यवस्था भी किया है। पत्र के माध्यम से वृहद व सुसज्जित भवन, हॉल, पर्यटकों के लिए विश्राम कक्ष, बगीचा, सुरक्षा के लिए बाउंड्रीवाल, सीमेंट की कुर्सियों के अलावा प्रमुख रूप से प्रतिमाओं का केमीकल रंग रोंगन किए जाने की मांग की गई है। लेकिन अब तक इस दिशा में कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आए हैं।

वर्सन

संग्रहालय में दुर्लभ मूर्तियों को संरक्षित कर रखा गया है। नेरोगेज ट्रेन की बोगी देश के किसी भी संग्रहालय में आपकों देखने नहीं मिलेगी। इस कारण पुरातत्व क्षेत्र में बालाघाट के संग्रहालय का बहुत नाम है। शासन से बजट के अभाव में प्रतिमाओं का रंग रोंगन नहीं हो पा रहा है। इसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
डॉ वीरेन्द्र सिंह गहरवार, अध्यक्ष पुरातत्व संग्रहालय