
बालोद. जिला मुख्यालय के शासकीय कन्या पूर्व माध्यमिक शाला बालोद में इस वर्ष छात्राओं को प्रशासन ने ऐसा गणवेश वितरण किया है जो कि घरों में पहनने में उपयोग किया जा रहा है। मतलब गणवेश का स्तर इतना निम्न है कि बच्चे उसे पहनकर शर्मिंदगी महसूस करते हैं। इसलिए बच्चे स्कूल से मिले गणवेश को घर पर ही पहनना ठीक मानते हैं।
शासन से मिला कपड़ा काफी खराब और स्तरहीन है। कपड़ा अभी से दरकने लगा है। सिलाई सही नहीं है। किसी में बटन चार तो किसी में पांच है। किसी का काज सही नहीं है। कोई गणवेश काफी बड़ा, तो किसी का एकदम छोटा है। एक दिन पहनने से ही कपड़े में पूरी तरह से खिंचाव जैसे सल बन जाते हैं। इस बात को शिक्षक भी मान रहे हैं।
यह शासन की एक ऐसी योजना है जिसमें सरकारी स्कूल में पढऩे वाले गरीब बच्चे जो स्कूल गणवेश सहित अन्य पढ़ाई के लिए उपयोगी तमाम सामान को खरीदने में असमर्थ हैं। ऐसे में शासन की ओर से स्कूल में उपयोग होने वाले ड्रेस का वितरण छात्र-छात्राओं में नि:शुल्क किया जाता है, लेकिन नगर पालिका के पास स्थित शासकीय कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय बालोद में शासन की योजना के तहत छात्राओं को ड्रेस तो दिया गया, लेकिन वह सिर्फ घर तक ही सीमित है।
स्कूल के प्राचार्य एमएल चंद्राकर व पालकों ने बताया वर्तमान में उक्त स्कूल में जो ड्रेस चलता है उसके अनुरूप ड्रेस बच्चों को नही दिया गया है। स्कूल में तो दूसरे रंग का ड्रेस चलता है। बड़ा सवाल यह है कि जब स्कूल में जो ड्रेस चलता नहीं वैसा ड्रेस देते ही क्यों हैं? ऐसा ड्रेस देकर शिक्षा विभाग एक औपचारिकता निभा रहा है। यह स्थिति जिले के दर्जनों स्कूलों की है जहां से गणवेश को लेकर शिकायतें मिली है।
पालकों ने बताया स्कूल में जो बच्चों को ड्रेस दिया गया है वह स्कूल के लिए एक बार भी उपयोग नहीं हुआ है। केवल घरों में ही पहनने के लिए उस गणवेश का उपयोग कर रहे हैं बच्चे। कपड़ा स्तरहीन होने के कारण कई छात्राओं ने तो ड्रेस वितरण की तिथि से लेकर आज तक एक बार भी न तो घरों में और न ही स्कूल में उपयोग किया। जैसे ड्रेस को स्कूल से घर लाए थे उसी तरह आज भी धूल लगते पड़ा है।
अधिकारी ने कहा हम कुछ नहीं कर सकते
स्कूल के प्राचार्य एमएल चंद्राकर ने मीडिया से चर्चा में कहा कि ड्रेस जो वितरण किया गया है वह ट्विनिक ड्रेस है जो कि प्राथमिक स्कूल के बच्चों को दिया जाना चाहिए, लेकिन माध्यमिक स्कूल में वितरण कर दिया गया। दूसरी बात उन्होंने यह भी कहा कि कई ड्रेस तो काफी छोटे-बड़े भी हैं।
शासन द्वारा दिया गया है इसके कारण हमें रखना पड़ा। इस संबंध में राजीव गांधी परियोजना अधिकारी से चर्चा कर शाला विकास समिति के सदस्यों ने शिकायत भी की थी, लेकिन उक्त अधिकारी ने भी यह कहकर अपना हाथ खींच लिया कि शासन द्वारा ड्रेस आया है इसमें हम कुछ नहीं कर सकते।
शिक्षा विभाग इस बात से है अनभिज्ञ
इस संबंध में मीडिया ने जब जिला शिक्षा अधिकारी बीआर धु्रव से चर्चा की तो उन्होंने कहा कि शासन की ओर से जैसा ड्रेस आएगा वैसा ड्रेस हम स्कूलों में देंगे। मीडिया ने सवाल किया कि स्कूल में दिया गया ड्रेस घरों में उपयोग हो रहा है ऐसा क्यों? इसमे धु्रव ने कहा कि स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को स्कूली उपयोग के लिए दिया गया है न कि घर में उपयोग के लिए, लेकिन जब शासन द्वारा दिया गया ड्रेस स्कूल में चलता ही नहीं तो बच्चे कैसे उस ड्रेस को पहनकर स्कूल जाएंगे।
Published on:
09 Oct 2017 10:55 am
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