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guest editor : बचपन में किया संघर्ष, अब लोगों को शिक्षित करने गांव-गांव घूम रही

गुंडरदेही की रहने वाली 65 वर्षीय पद्मश्री शमशाद बेगम इन दिनों युवाओं व महिलाओं के प्रेरणास्रोत बनी हुई है। बचपन से संघर्ष कर आगे बढ़ीं, फिर साक्षरता अभियान से जुड़कर लोगों को साक्षर करने की ठानी।

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पद्मश्री शमशाद बेगम

पद्मश्री शमशाद बेगम

सतीश रजक/बालोद. गुंडरदेही की रहने वाली 65 वर्षीय पद्मश्री शमशाद बेगम इन दिनों युवाओं व महिलाओं के प्रेरणास्रोत बनी हुई है। बचपन से संघर्ष कर आगे बढ़ीं, फिर साक्षरता अभियान से जुड़कर लोगों को साक्षर करने की ठानी। वे कहती हैं कि बचपन से ही पढ़ाई की ललक थी। आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। मां ने पढ़ाई के लिए अपने जेवर भी बेच दिए। लोगों के कपड़े सील कर आगे पढ़ाया और बढ़ाया। जैसे-तैसे ग्यारहवीं की पढ़ाई करने के बाद लोगों को शिक्षित करने गांव-गांव घूमकर साक्षरता अभियान से जोड़ा।

नशामुक्ति का अभियान चलाया
शमशाद बेगम ने नशामुक्त गांव व समाज बनाने 2006 से ही महिला कमांडो संगठन तैयार किया। साक्षरता अभियान व नशा मुक्ति अभियान से आए बदलाव व प्रभाव को देखते हुए 2012 में शासन ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वहीं शासन व अन्य संगठनों से भी सम्मान मिला।

जिले में लगभग 14 हजार महिला कमांडो
पद्मश्री शमशाद बेगम साक्षरता के साथ गांव-गांव में नशामुक्ति अभियान भी चला रही हैं। 2006 में पहली बार महिला कमांडो का गठन किया। शुरुआत में 100 लोग जुड़े थे। अब पूरे जिले में 14 हजार से अधिक महिला कमांडो हैं, जो गांवों में गश्त कर नशा मुक्ति अभियान चला रही हैं। राजनांदगांव, दुर्ग, कवर्धा में भी महिला कमांडो का गठन कर रही हैं।

स्कूलों में बांट रही हैं कॉपी, पेन, कंपास
उन्होंने बताया कि उनकी टीम जिले सहित राजनांदगांव, कवर्धा के स्कूली बच्चों को शिक्षा प्रोत्साहन के तहत जरूरी सामग्री का वितरण कर रही है। इस साल 2500 स्कूली बच्चों को इसका लाभ मिल चुका है। आगे 10 हजार बच्चों को लाभ देने की तैयारी है। अधिकांश बच्चे बालोद जिले के ही हैं।