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आश्चर्य : यहां धधकती आग में चलते हैं बच्चे व बुजुर्ग नंगे पाव

गुरुवार को होलिका जलेगी। हालांकि इस बार कोरोना संक्रमण का असर नहीं रहेगा। उत्साह व विधि-विधान से शुभ मुहूर्त में होलिका जलेगी। लेकिन बालोद जिले के कई गांव ऐसे हैं, जहां अलग- अलग कारणों से होलिका नहीं जलाई जाती है। यह परंपरा सैंकड़ों वर्षों से है।

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,होलिका विशेष: होली पर गांवों में कई परंपरा, कई गांवों में नहीं जलाई जाती होलिका

सोहपुर में नहीं जलाई जाएगी होलिका।,होलिका जलाने के लिए तैयारी पूरी कर ली गई है।

बालोद . गुरुवार को होलिका जलेगी। हालांकि इस बार कोरोना संक्रमण का असर नहीं रहेगा। उत्साह व विधि-विधान से शुभ मुहूर्त में होलिका जलेगी। लेकिन बालोद जिले के कई गांव ऐसे हैं, जहां अलग- अलग कारणों से होलिका नहीं जलाई जाती है। यह परंपरा सैंकड़ों वर्षों से है। ग्रामीणों के मुताबिक कहीं दैवीय प्रकोप, तो कहीं होलिका जलाने से गांव में आग के गोले बरसने की घटना, कहीं अन्य कारण से होलिका नहीं जलाई जाती। डौंडीलोहारा विकासखंड मुख्यालय से चार किलोमीटर दूर जाटादाह गांव की खास परंपरा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि इस गांव में यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है। यहां होलिका दहन पर एक विशेष मुहूर्त निकाला जाता है। गांव के लोग होली की आग से नंगे पांव निकलते हैं। आज तक इस परंपरा में कोई भी हताहत नहीं हुआ है।

अंगारे पर चलने से होती मनोकामना पूर्ण
मान्यता है कि होलिका दहन के बाद अंगारों पर नंगे पांव चलने से मनोकामना पूर्ण होती है। किसी आपदा या बीमारी से गांव को बचाने के लिए इस परंपरा को निभाते हैं। सालों पुरानी इस परंपरा में गांव के बुजुर्ग से लेकर बच्चे भी होलिका के आग पर नंगे पांव ऐसे चलते हैं। मानो जमीन पर चल रहे हो। ऐसा करने में न तो किसी के पैरों में छाले पड़ते हैं, न ही आज तक कोई हताहत हुआ है। ग्रामीणों के मुताबिक होलिका के बाद आग में चलने की परम्परा है। यह कब से है, वे नहीं जानते।

हैजा के कारण नहीं जलाते होलिका
गुंडरदेही ब्लॉक के ग्राम चंदनबिरही में 9 दशकों से होलिका नहीं जली। ग्रामीणों के मुताबिक गर्मी के दिनों में गांव में हैजा प्रकोप बन कर टूट पड़ता था। बच्चे मर रहे थे। यह बात है 1925 से पहले की है। ग्रामीण महिलाओं को गर्भ के समय गांव से बाहर भेजने लगे, लेकिन जब महिलाएं वापस आती थीं तो बच्चे मरने लग जाते थे। तब चंदनबिरही के जमींदार निहाल सिंह जो गुंडरदेही के राजा थे। उन्होंने गांव में होली खेलना और जलाना बंद करा दिया, तब से ना ही होलिका जली और ना ही होली खेली गई।

झलमला में भी नहीं जलाते होलिका
बालोद जिला मुख्यालय से महज 3 किलोमीटर दूर मुख्य मार्ग में स्थित ग्राम झलमला गंगा मैया स्थल के कारण पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है, लेकिन होली पर होलिका नहीं जलाई जाती है, लेकिन दूसरे दिन रंग और गुलाल खेला जाता है। ग्रामीण पालक ठाकुर का कहना है कि यह परंपरा 111 वर्षों से भी ज्यादा समय से चली आ रही है। उनके बुजुर्ग ने उन्हें बताया कि होलिका दहन करने से गांव में कुछ बुरा हो जाएगा।

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लगती थी आग, नहीं जलाते होलिका
गुरुर विकासखंड के सोहपुर में 151 साल से होलिका दहन नहीं किया गया है। ग्रामीणों ने बताया कि जब भी होलिका दहन किया जाता था तो गांव में आग के गोले बरसने लगते थे। किसी न किसी के घर में आगजनी की घटना होती थी। ऐसे में बुजुर्गों ने होलिका दहन नहीं करने का फैसला किया। सोहपुर के 60 वर्षीय पटेल तुकाराम सोरी ने बताया कि आगजनी से पूरा गांव परेशान था। ज्योतिषाचार्य ने गांव में हनुमान जी की मूर्ति स्थापित कर पूजा-अर्चना करने कहा। ग्रामीणों का दावा है कि यहां आज भी जमीन के अंदर घरों के जलने के अवशेष मिलते हैं। लोग होली के दिन सूखी होली मनाते हैं।