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जीवन में प्रवृत्ति और निवृत्ति का संतुलन जरूरी- मुनि सुधाकर

मुनि हलेबुदनूर से विहार कर मंड्या पहुंचे

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जीवन में प्रवृत्ति और निवृत्ति का संतुलन जरूरी- मुनि सुधाकर

जीवन में प्रवृत्ति और निवृत्ति का संतुलन जरूरी- मुनि सुधाकर

बेंगलूरु. मुनि सुधाकर व मुनि नरेशकुमार हलेबुदनूर से विहार कर मंड्या स्थित तेरापंथ सभा भवन पधारे। जहां पर तेरापंथ समाज की विभिन्न संस्थाओं से लोगों ने मुनि का भव्य स्वागत किया। मुनि ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा जीवन में प्रवृत्ति और निवृत्ति का संतुलन जरूरी है। खाने के साथ नहीं खाने का अभ्यास भी जरूरी है। खाद्य संयम के विविध प्रकार है अपनी शक्ति के अनुसार उनका अनुसरण करना चाहिए। जैन धर्म की साधना में उनोदरी तप का बहुत महत्व बताया है। उसका तात्पर्य है भूख से कम खाना अपने पेट को हल्का रखना। इसी प्रकार बोलने के साथ प्रतिदिन थोड़ा मौन व्रत भी करना चाहिए। आज हर मनुष्य का मस्तिष्क विचारों से बहुत भारी हो रहा है इसे नाना प्रकार के रोग और तनाव बढ़ रहे हैं। ध्यान और स्वाध्याय से मस्तिष्क की मशीन को हम विश्राम देना चाहिए। प्रेक्षा ध्यान के योगिक प्रयोगों से हम मानसिक रोगों और तनाव से छुटकारा पा सकते हैं। जो लोग प्रवृत्ति के साथ निवृत्ति का अभ्यास नहीं करते हैं उनका जीवन नाना प्रकार की समस्याओं से ग्रसित हो जाता है। कार्यक्रम की शुरुआत तेरापंथ महिला मंडल द्वारा मंगलाचरण से की गई। तेरापंथ सभा मंत्री नरेंद्र दक, महिला मंडल अध्यक्षा नमिता भंसाली ने मुनि के स्वागत में अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर सभा अध्यक्ष खजुरीमल रायसोनी, उपाध्यक्ष अर्जुनलाल खिंवेसरा, तेयुप अध्यक्ष नितिन भंसाली, महावीर भंसाली, विक्रम पुगलिया, नवरत्न बरडिय़ा व श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। संचालन सभा से विनोद भंसाली ने किया।

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