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अब आसानी से हो सकेगी ब्रेन ट्यूमर ग्लियोब्लास्टोमा की पहचान

जीबीएम इतना आक्रामक है कि पुष्टि के 10-15 महीने में मरीज की मौत हो जाती है। ऐसे में समय रहते इसकी पहचान हो तो मरीज को बचाने की संभावना बढ़ेगी।

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Manjoor Ahamad

Aug 22, 2015

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File Photo

बेंगलूरु
.सबसे घातक और आक्रामक किस्म के ब्रेन ट्यूमर ग्लियोब्लास्टोमा मल्टीफार्म (जीबीएम) की अब जल्दी और आसानी पहचान करना संभव हो सकेगा। शहर में स्थित प्रतिष्ठित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है। वैज्ञानिक, रक्त सीरम में मौजूद सी-रिएक्टिव प्रोटीन (सीआरपी) को जीबीएम की पहचान में महत्वपूर्ण कड़ी मान रहे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक जीबीएम के मरीजों में सीआरपी का स्तर सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा होता है। इसका कारण है कि मरीज के मस्तिष्क में मौजूद ट्यूमर से निकलने वाला इंटरल्यूकिन-6 (आईएल 6) अणु, जिगर तक पहुंच इसे ज्यादा सीआरपी बनाने पर मजबूर करता है। इस आधार पर सीआरपी के बढ़े स्तर को जीबीएम का सूचक माना जा सकता है।


तीन ऐसे प्रोटीन हैं ,जिनके स्तर के उतार-चढ़ाव के आधार पर जीबीएम की पुष्टि करने में सफलता हाथ लगी है।

शोध में शामिल आईआईएससी के माइक्रोबायोलॉजी और सेल बायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. के.सोमसुंदरम का कहना है कि सीआरपी, ल्यूकोसाइट अडहेशन मोलेक्यूल-1 और बीएचई-40 रक्त सीरम में पाए जाने वाले
तीन ऐसे प्रोटीन हैं ,जिनके स्तर के उतार-चढ़ाव के आधार पर 90 फीसदी शुद्धता के साथ मरीज में जीबीएम की पुष्टि करने में सफलता हाथ लगी है।
जीबीएम के मरीजों में सीआरपी की मात्रा स्वस्थ लोगों से ज्यादा तो होती ही है। लेकिन ल्यूकोसाइट अडहेशन मोलेक्यूल-1 और प्रोटीन बीएचई-40 की मात्रा कम होती है।


सीआरपी के बढ़ते स्तर के साथ घट जाती है मरीज के बचने की संभावना


शोघ पत्र की मुख्य लेखक व शोधार्थी ममता एन. के अनुसार सीआरपी के बढ़ते स्तर के साथ मरीज के बचने की संभावना घट जाती है।
जीबीएम इतना आक्रामक है कि पुष्टि के 10-15 महीने में मरीज की मौत हो जाती है। ऐसे में समय रहते इसकी पहचान हो तो मरीज को बचाने की संभावना बढ़ेगी।
रक्त सीरम के साधारण जांच से बेहद कम कीमत और कम-से-कम समय में जीबीएम का पता लगा मरीज को बचाया जा सकता है। कई मामलों में सिटी स्कैन और एमआरआई जैसे महंगे जांच की जरूरत नहीं पड़ेगी।