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इतिहास दोहराने के साथ जनाधार बढ़ाने की दोहरी चुनौती

अब तक एक चेहरे, एक समुदाय पर निर्भर रही है भाजपा

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इतिहास दोहराने के साथ जनाधार बढ़ाने की दोहरी चुनौती

इतिहास दोहराने के साथ जनाधार बढ़ाने की दोहरी चुनौती

बेंगलूरु. सत्तारूढ़ भाजपा दक्षिण के किले को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रही है। सवाल है कि क्या भाजपा 38 साल पुराना इतिहास दोहरा पाएगी? भाजपा के सामने इस चुनाव में एक और बड़ी चुनौती अपना जनाधार बढ़ाने की भी है। पार्टी अब तक, काफी हद तक लिंगायत मतदाताओं पर निर्भर रही है। इस बार उसकी पूरी कोशिश राज्य के दूसरे बड़े मतदाता वर्ग तक पहुंचने की है।

चुनावों की घोषणा से कुछ ही दिन पहले बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली सरकार ने मुसलमानों के 4 फीसदी आरक्षण को हटाकर उसे वीरशैव लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय के बीच 2-2 फीसदी विजाजित करने का फैसला किया। वहीं, रामनवमी के दिन बेंगलूरु से करीब 60 किमी दूर रामनगर जिले के रामदेवरा पहाड़ी पर भगवान राम के मंदिर निर्माण का 3 डी इंप्रेशन भी जारी किया गया। भाजपा की यह रणनीति केवल धार्मिक आधार पर वोटों के धु्रवीकरण तक सीमित नहीं है। दरअसल, यह राज्य के दूसरे बड़े मतदाता वर्ग को लुभाने का एक संकेत है। जहां वीरशैव लिंगायत भाजपा के पारंपरिक मतदाता रहे हैं वहीं, वोक्कालिगा या तो जद-एस या कांग्रेस के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। तटीय कर्नाटक में भले ही हिंदुत्व की अपील भाजपा के पक्ष में काम करती है लेकिन, राज्य के अन्य क्षेत्रों में यह प्रभावी नहीं है। यहीं कारण है कि प्रदेश के लगभग 57 सीटों वाले ओल्ड मैसूरु क्षेत्र में भाजपा अब तक अपनी पांव जमा नहीं पाई है।

इस बार के चुनावों में भाजपा वोक्कालिगा हार्टलैंड में अपनी स्थिति मजबूत करने की हर संभव कोशिश कर रही है। शोभा करंदलाजे को चुनाव प्रबंधन समिति का प्रमुख नियुक्त किया जाना भी इस बात का संकेत है कि भाजपा लिंगायत समर्थन को बरकरार रखते हुए वोक्कालिगा तक अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि बीएस येडियूरप्पा और लिंगायत समुदाय पार्टी के लिए अपने आप एक मुद्दा बन गए थे। भाजपा चाहती है कि उसे विचारधारा, संगठन और पार्टी के नाम पर वोट मिले ना कि, किसी एक नेता के चेहरे पर। लेकिन, जब येडियूरप्पा मुख्यमंत्री पद से हटे तो भाजपा ने तुरंत यह महसूस किया कि, अभी भी लिंगायत समुदाय के समर्थन की कुंजी येडियूरप्पा ही हैं। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों के परिणाम भी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के सामने है। इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व ने येडियूरप्पा को पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान देते हुए अपने जनाधार को बढ़ाने की रणनीति अपनाई।

इस बार के विधानसभा चुनावों में यह स्पष्ट है कि येडियूरप्पा भाजपा में मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या लिंगायत मतदाता वैसे ही भाजपा के पक्ष में मतदान करेंगे जैसा येडियूरप्पा के लिए करते रहे हैं। लिंगायत राज्य की राजनीति में प्रमुख निभाते रहे हैं। प्रदेश की लगभग 100 सीटों पर इनका दबदबा है। निवर्तमान विधानसभा में सत्तारूढ़ भाजपा के 37 सहित सभी दलों के 54 लिंगायत विधायक हैं। वर्ष 1952 के बाद से राज्य के 23 मुख्यमंत्रियों में से 10 लिंगायत रहे हैं।