- तीन फीसदी परिवारों को ही मिला नकद हस्तांतरण योजनाओं का कुछ लाभ : अध्ययन
- उधार के लिए अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ी
- 12 फीसदी परिवार को नहीं मिला ऋण
- 41 प्रतिशत श्रमिक काम से वंचित
बेंगलूरु. कोरोना महामारी (Corona Pandemic) गरीब परिवारों और श्रमिकों पर विशेष रूप से भारी पड़ी है। केवल तीन फीसदी परिवारों को राज्य सरकार द्वारा घोषित नकद हस्तांतरण योजनाओं का लाभ मिल सका है। कोविड के दौरान उधार के लिए अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ी। महामारी के जोर के दौरान 40 फीसदी लोगों ने औसत से कम खुराक पर गुजारा किया। 11 प्रतिशत परिवारों को दैनिक खर्च या पुराने कर्ज चुकाने के लिए उधार लेने पर मजबूर होना पड़ा। लेकिन, 12 फीसदी परिवार कोशिश करने के बावजूद उधार नहीं ले सके। कुछ खास वर्ग के लोगों को दूसरे तबकों से ज्यादा परेशानी हुई। नौकरी और आय का नुकसान 2020 के लॉकडाउन के बाद भी बना रहा। 41 प्रतिशत श्रमिकों के पास कोई काम नहीं था। अन्य 21 प्रतिशत ने वर्ष 2021 के जनवरी-फरवरी में कम कमाई की। दैनिक वेतन भोगी, घरेलू कामगार और खुदरा क्षेत्र के कर्मचारी सबसे अधिक प्रभावित हुए।
33 वार्ड, 92 बस्तियां, 3000 घर
ये तमाम तथ्य अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा बेंगलूरु के 33 वार्ड की 92 कम आय वाली बस्तियों में नौ सिविल सोसायटी संगठनों (सीएसओ) के सहयोग से कराए गए 3,000 घरों के सर्वेक्षण में सामने आए हैं। सर्वेक्षण कोरोना महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन (lockdown) के निरंतर प्रभाव और रोजगार और आजीविका के आर्थिक व्यवधानों का अनुमान लगाने के लिए किया गया था। सर्वेक्षण में सरकारी सहायता तंत्र तक पहुंच की जानकारी हासिल की गई। इसमें कैब, ऑटो ड्राइवर, दैनिक वेतन भोगी, निर्माण, घरेलू कामगार और कारखानों के श्रमिक आदि को शामिल किया गया। यह सर्वेक्षण नवंबर 2021 में एक्शन ऐड, एसोसिएशन फॉर प्रोमोटिंग सोशल एक्शन, सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च और संगमा आदि की मदद से किया गया।
संपत्ति बेचने या गिरवी रखने को मजबूर
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय (Azim Premji University) में सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट के प्रमुख अमित बसोले ने बताया कि अतिरिक्त 15 फीसदी परिवारों ने कोविड के दौरान उधार नहीं लिया। लेकिन, संपत्ति बेचने या गिरवी रखने पर मजबूर हुए। जिन्हें संपत्ति बेचने या गिरवी रखने की जरूरत पड़ी, उनमें से 97 फीसदी ने आभूषण से काम चलाने की बात कही। छह वर्ष से कम उम्र के बच्चे या गर्भवती या फिर स्तनपान कराने वाली मां होने पर सशर्त, कोविड के दौरान आंगनवाडिय़ों और आइसीडीएस से पूरक पोषण या विकल्प प्राप्त करने वाले परिवारों का प्रतिशत 38 रहा। कोरोना महामारी से पहले यह 24 फीसदी था।
डेढ़ वर्ष बाद भी काम नहीं
अल्पसंख्यक समुदाय के 10 फीसदी पुरुष और 15 फीसदी महिलाएं महामारी के डेढ़ वर्ष बाद तक बिना काम के रहे। गरीबी पहले से ज्यादा थी और महामारी के बाद और बढ़ गई।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली
बीपीएल कार्ड वाले 55 फीसदी परिवारों ने कहा कि दूसरे लॉकडाउन के बाद से उन्हें सभी महीनों में नियमित मात्रा से अधिक अनाज मिला। अन्य 32 फीसदी लोगों को कम से कम कुछ महीनों में अतिरिक्त अनाज मिला।
जन धन योजना का खाता नहीं
78 फीसदी परिवारों के पास महिला स्वामित्व वाला जन धन खाता नहीं है। जिनके पास खाता था, उनमें से 75 फीसदी ने कुछ हस्तांतरण प्राप्त करने की सूचना दी और 40 फीसदी ने पूर्ण 1500 रुपए प्राप्त करने की सूचना दी।
शासन प्रणालियों में हो तत्काल सुधार
महामारी ने दिखाया है कि शहरों में गरीब कितने अदृश्य हैं और सार्वजनिक व्यवस्था जरूरतमंद और सबसे कमजोर लोगों तक पहुंचने में कितनी कमजोर है। शहर की शासन प्रणालियों को सुधारने की तत्काल आवश्यकता है।
- हाइमा वदलमणि, मुख्य सदस्य, कोविड प्रतिक्रिया टीम, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन