
निम्हांस की सातवीं कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव
- 38 फीसदी कॉलर कर्नाटक से
निखिल कुमार.
बेंगलूरु. किसी की नौकरी चली गई है तो किसी को भविष्य में नौकरी खोने का डर है। कइयों को संक्रमित होने का डर है तो कई इस बात से चिंतित हैं कि कोविड-19 से मौत होने पर उनके परिवार का क्या होगा। स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, अपनों को खोने का डर, वेतन में कटौती, महीनों से लंबित वेतन, बच्चों की फीस, मकान का किराया, व्यापार में घाटा, आर्थिक नुकसान, ठप्प कमाई, अनिद्रा और बच्चों के साथ खुद के भविष्य आदि को लेकर लाखों कॉलरों ने चिंता व्यक्त की है या कर रहे हैं। ऐसे लोगों की कतार दिन-ब-दिन लंबी होती जा रही है।
हैरान, परेशान, चिंतित, घबराए और अवसादग्रस्त (Shocked, upset, worried, nervous and depressed) ये वे लोग हैं जो हर दिन राष्ट्रीय मानसिक आरोग्य व स्नायु विज्ञान संस्थान (निम्हांस) के मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों व परामर्शदाओं को फोन पर अपना दुखड़ा सुना मदद मांगते हैं। यह सिलसिला करीब ढाई माह से जारी है। निम्हांस (NIMHANS) ने लोगों की मनोसामाजिक सहायता और मानसिक स्वास्थ्य सेवा (Psychosocial Support and Mental Health Services) के लिए अखिल भारतीय हेल्पलाइन शुरू कर रखी है। रांची स्थित केंद्रीय मनोविज्ञान संस्थान सहित निम्हांस ने देश भर के 50 स्वास्थ्य संस्थानों को इस अभियान में शामिल किया है। 450 से ज्यादा मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर इसमें मदद कर रहे हैं।
कॉलरों में 74 फीसदी पुरुष व 26 फीसदी महिलाएं
निम्हांस (The National Institute of Mental Health and Neuro-Sciences) के कुलसचिव व आपदा प्रबंधन विभाग के प्रमुख प्रो. डॉ. के. शेखर ने बताया कि 29 मार्च को सेवा शुरू होने के बाद 15 जून तक तीन लाख से ज्यादा लोगों ने परामर्श लिया है। कॉल करने वालों में 74 फीसदी पुरुष व 26 फीसदी महिलाएं हैं। तीन लाख में से 38 फीसदी यानी 114000 कॉलर कर्नाटक से हैं। 29 मार्च से देश भर से प्रतिदिन औसतन 3846 और कर्नाटक से 1461 कॉल्स आए हैं। हिंदी, अंग्रेजी व कन्नड़ सहित 14 भाषाओं में परामर्श उपलब्ध है। फिलहाल प्रतिदिन 800 से 1000 कॉल्स आ रहे हैं।
अब स्वास्थ्य कर्मियों को भी मनोसामाजिक सहायता
डॉ. शेखर ने बताया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के निवेदन पर अब स्वास्थ्य कर्मियों के लिए भी ये सेवा शुरू की गई। अब तक बच्चे, वयस्क, बुजुर्ग व नि:शक्तजनों को प्राथमिकता मिल रही थी। 80 फीसदी से ज्यादा कॉलर खौफ व घबराहट का सामना कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों व अवैज्ञानिक खबरों ने स्थिति को और गंभीर कर दिया है। फोन करने वालों में कई ऐसे लोग हैं जिनका मानसिक स्वास्थ्य पहले एकदम दुरुस्त था। हजारों कॉलर उम्र व समुदाय संबंधित मुद्दों का भी सामना कर रहे हैं।
सोशल मीडिया का सहारा भी
उन्होंने बताया कि कोरोनाफोबिया (Coronaphobia) व अनिश्चित भविष्य सहित लोगों को अन्य मानसिक परेशानियों से निजात दिलाने के लिए निम्हांस सोशल मीडिया (Social Media) का सहारा भी ले रहा है। जिस पर नियमित रूप से लघु फिल्मों के साथ खुश व तनावमुक्त रहने के गुर सीखाए जा रहे हैं। लोगों के दिलोदिमाग से चिंता, घबराहट, अवसाद और खौफ से निजात दिलाने की कोशिशें जारी हैं। लोगों को समझाया जाता है कि इस संकट में वे अकेले नहीं हैं।
अग्रिम मोर्चे पर तैनात मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर सबसे पहले कॉलरों से बात करते हैं। लोगों की समस्याओं को सुलझाने (phone counseling) की कोशिश करते हैं। जरूरत पडऩे पर मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों व मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ताओं (Psychologists, psychiatrists and psychiatric social workers) को मामना रैफर किया जाता है।
प्रति लाख आबादी पर एक मनोचिकित्सक
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार देश की 1.3 अरब की आबादी में से 9 करोड़ से ज्यादा लोग किसी न किसी किस्म के मानसिक अवसाद की चपेट में पहले से ही हैं। संगठन ने वर्ष 2020 के आखिर तक 20 फीसदी आबादी के मानसिक बीमारियों (Mental Illness)की चपेट में आने का अंदेशा जताया है।
निम्हांस ने (National Mental Health Survey) राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 में खुलासा किया था कि भारत में अनुमानित 15 करोड़ लोगों को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता है। हर 20 में से एक व्यक्ति किसी न किसी कारण अवसाद की अवस्था में रहता है। देश में 9000 से कुछ ही ज्यादा मनोचिकित्सक हैं। यानी प्रति लाख आबादी पर एक मनोचिकित्सक। ऐसे में समस्या का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।
Updated on:
21 Jun 2020 11:37 pm
Published on:
21 Jun 2020 09:57 pm

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