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हाइ कोर्ट का विश्वविद्यालयों को निर्देश : प्रमाण पत्र के लिए ट्रांसजेंडर को अदालतों में न ले जाएं

नाम और यौन परिवर्तन के बावेदनों पर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन करें

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बेंगलूरु. कर्नाटक हाइ कोर्ट ने शैक्षणिक प्रमाणपत्रों में नाम और gender परिवर्तन के लिए लोगों को अदालतों का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर नहीं करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने शैक्षणिक संस्थानों को सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन करने का निर्देश दिया है। अदालत ने एक ट्रांसजेंडर की उस याचिका को स्वीकार करते हुए यह निर्देश दिया, जिसमें उसने अपने नए पुरुष नाम के साथ मणिपाल विश्वविद्यालय से नया स्नातकोत्तर प्रमाणपत्र लेने की मांग की थी।

अदालत ने कहा कि विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थानों के समक्ष ऐसे असंख्य मामले विचाराधीन हैं। ऐसे में नाम और gender परिवर्तन के लिए आवेदन अनुरोध प्राप्त होने पर अधिकारियों को उन दिशा निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई करना उचित होगा, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के मामले में और क्रिस्टीना लोबो के मामले में इस न्यायालय द्वारा सभी आवेदकों को दिशा-निर्देश प्राप्त करने के लिए अदालत में भेजने के बजाय निर्धारित किए गए थे।

विहान पीतांबर ने एक याचिका के साथ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिस पर न्यायमूर्ति रवि वी. होस्मानी ने सुनवाई की और इसका निपटारा कर दिया। विहान की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जयना कोठारी ने कहा कि उन्होंने 2008 में विश्वविद्यालय में पीजी एमएस कम्युनिकेशन पाठ्यक्रम पूरा किया था और उन्हें ज्योति पीतांबर के नाम से मार्कशीट और प्रमाण पत्र प्रदान किया गया था। जन्म से महिला होने के बावजूद, उन्होंने 2015 में gender परिवर्तन सर्जरी करवाई। gender बदलवा कर पुरुष बने और नाम 'विहान पीतांबर' रख लिया। उन्होंने अपने नाम पर नया पैन, आधार, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट और डिग्री प्रमाण पत्र प्राप्त किया।

हालाँकि, मणिपाल विश्वविद्यालय ने साल 2017 में उनके अनुरोध को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि प्रमाणपत्र पहली बार जारी होने के बाद परिवर्तन केवल छोटी अवधि के भीतर ही संभव था। हाई कोर्ट ने दो फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिशानिर्देश जारी किए गए थे।

याचिका को अनुमति देते हुए उन्होंने कहा, याचिकाकर्ता को चार सप्ताह की अवधि के भीतर प्रतिवादी नंबर एक- विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को मूल अंक कार्ड और डिग्री प्रमाण पत्र संलग्न करते हुए आवेदन दाखिल करने की अनुमति है। इसकी प्राप्ति पर प्रतिवादी नंबर एक- विश्वविद्यालय इसके बाद चार सप्ताह के भीतर एनएलएसए के मामले और क्रिस्टीना लोबो के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित निर्देशों के अनुसार कार्रवाई करने पर विचार करेगा।

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