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मुडा मामले में लोकायुक्त पुलिस की जांच पर हाई कोर्ट ने लगाई अस्थायी रोक, अंतिम जांच रिपोर्ट की अवधि बढ़ाई

जज एम. नागप्रसन्ना ने कहा कि लोकायुक्त को मामले में आगे की जांच करने से तब तक बचना चाहिए जब तक कि उच्च न्यायालय घोटाले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) कराने की मांग वाली याचिका पर अंतिम सुनवाई पूरी नहीं कर लेता।

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सीबीआई जांच की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई

बेंगलूरु. कर्नाटक उच्च न्यायालय ने गुरुवार को मैसूरु लोकायुक्त पुलिस को मैसूरु शहरी विकास प्राधिकरण (मुडा) के वैकल्पिक भूमि आवंटन घोटाले में मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या और अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ आगे जांच करने से रोक दिया। न्यायालय ने लोकायुक्त पुलिस के ट्रायल कोर्ट के समक्ष अंतिम जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने की समय सीमा भी 28 जनवरी 2025 तक बढ़ा दी।

एकल पीठ के जज एम. नागप्रसन्ना ने कहा कि लोकायुक्त को मामले में आगे की जांच करने से तब तक बचना चाहिए जब तक कि उच्च न्यायालय घोटाले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) कराने की मांग वाली याचिका पर अंतिम सुनवाई पूरी नहीं कर लेता। उच्च न्यायालय ने मुडा घोटाले में तीन शिकायतकर्ताओं में से एक कार्यकर्ता स्नेहमयी कृष्णा की सीबीआई जांच की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश पारित किए।

कृष्णा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के.जी .राघवन ने पहले अदालत को बताया था कि लोकायुक्त पुलिस राज्य सरकार के अधीन है, इसलिए मुख्यमंत्री से जुड़े मामले में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं हो सकता है।

इस बीच, गुरुवार को सभी पक्षों के वकीलों ने न्यायालय को सूचित किया कि सिद्धरामय्या और उनकी पत्नी सहित प्रतिवादियों को न्यायालय द्वारा जारी किए गए नोटिस तामील कर दिए गए हैं। इस पर न्यायालय ने कहा कि वह 15 जनवरी, 2025 को कृष्णा की याचिका पर अंतिम दलीलें सुनेगा।

विशेष अदालत के लोकायुक्त पुलिस को 24 दिसंबर तक अंतिम रिपोर्ट पेश करने वाल निर्देश की जानकारी दिए जाने पर पीठ ने कहा, चूंकि उच्च न्यायालय अब सीबीआई जांच की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है, इसलिए निचली अदालत के समक्ष ऐसी रिपोर्ट प्रस्तुत करने पर अस्थायी रूप से रोक लगाई जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि लोकायुक्त पुलिस को अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने के लिए दिया गया समय इस साल 24 दिसंबर से बढ़ाकर 28 जनवरी, 2025 कर दिया जाएगा। कृष्णा ने मामले में प्रवर्तन निदेशालय को पक्षकार बनाने के लिए न्यायालय से अनुमति भी मांगी है। गुरुवार को कर्नाटक सरकार और सिद्धरामय्या की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस अनुरोध पर आपत्ति जताई। इसके बाद न्यायालय ने उन्हें 15 जनवरी तक अपनी आपत्तियां दाखिल करने का निर्देश दिया।