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सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का पहला फायरिंग परीक्षण जल्द

200 टन का इंजन बढ़ाएगा एलवीएम-3 की पे-लोड क्षमतातरल चरण एल-110 की जगह लगेगा

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सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का पहला फायरिंग परीक्षण जल्द

सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का पहला फायरिंग परीक्षण जल्द

बेंगलूरु.
अत्यंत जटिल और अति गोपनीय माने जाने वाले क्रायोजेनिक इंजन के विकास के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) सेमी क्रायोजेनिक इंजन का विकास कर रहा है जो एलवीएम-3 (जीएसएलवी मार्क-3) प्रक्षेपणयान में स्टोरेबल इंजन (तरल चरण एल-110) की जगह लेगा।
इसरो अध्यक्ष एस.सोमनाथ ने पत्रिका को बताया कि, यह 200 टन का इंजन है जिसका विकास पिछले 15 साल से किया जा रहा है। अब यह इंजन पहले पावरहेड तक पहुंच गया है। एसेंबलिंग का काम पूरा हो चुका है। इस इंजन के परीक्षण के लिए एक विशाल परीक्षण केंद्र की स्थापना पिछले महीने ही की गई और इस इंजन में पहली बार प्रणोदक भरा गया। यह सफल रहा है। अगले कुछ ही दिनों में इसकी पहली फायरिंग (दहन) होगी। उन्होंने बताया कि पहली फायरिंग के बाद अलग-अलग परिस्थितियों में 7 परीक्षण होंगे। हर परीक्षण दो-दो हफ्ते के अंतराल पर किया जाएगा। यदि परीक्षण सफल रहे तो अगले चरण में हार्डवेयर पर काम शुरू हो जाएगा।
रूस या यूक्रेन में थी परीक्षण की योजना
हालांकि, इसरो ने शुरूआत में रूस और यूक्रेन में इसके परीक्षण की योजना बनाई थी। क्योंकि, वहां, परीक्षण की सुविधाएं थीं। लेकिन, अब दोनों देश युद्धग्रस्त हैं और वहां पहुंचना संभव नहीं है। सोमनाथ ने कहा कि, अब भू-राजनीतिक स्थितियां वहां जाने की इजाजत नहीं देती। इसलिए एक बड़ा परीक्षण केंद्र स्थापित किया गया जिसे अभी चालू किया गया है। इस केंद्र को स्थापित करने में निजी उद्योगों ने काफी सहयोग किया। उन्हें बहुत खुशी है कि, निजी उद्योग इस तरह की परियोजनाओं में इसरो को सहयोग कर रहे हैं।
दो से ढाई गुना हो जाएगी पे-लोड क्षमता
सेमी क्रायोजेनिक इंजन एलवीएम-3 की पे-लोड क्षमता बढ़ाने के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण साबित होगा। फिलहाल एलवीएम-3 अधिकतम चार टन वजनी उपग्रहों को भू-तुल्यकालिक अंतरण कक्षा (जीटीओ) में स्थापित करने की योग्यता रखता है। सेमी क्रायोजेनिक इंजन के विकास के बाद वह अधिक ताकतवर हो जाएगा और 6 से 10 टन वजनी उपग्रहों को जीटीओ में पहुंचाने की योग्यता हासिल कर लेगा। सेमी क्रायोजेनिक इंजन में प्रणोदक (ईंधन) के तौर पर तरल हाइड्रोजन की जगह रिफाइंड केरोसिन का उपयोग किया जाएगा वहीं ऑक्सीडाइजर के तौर पर तरल ऑक्सीजन का ही इस्तेमाल होगा। नव विकसित सेमी क्रायोजेनिक इंजन एलवीएम-3 में तरल चरण एल-110 की जगह लेगा जबकि, तीसरा चरण क्रायोजेनिक अपर स्टेज सी-25 ही रहेगा। इस रॉकेट का पहला चरण एस-200 होता है जिसमें ठोस प्रणोदक का इस्तेमाल किया जाता है।