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कुमारस्वामी की मुश्किलें बढ़ाएगा सिद्धरामय्या का विदेश प्रवास!

राजनीति : सौ दिन का सफर पूरा होने से पहले ही भविष्य पर कयासों का दौर
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बैंगलोर

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Ram Naresh Gautam

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Updated: 28 Aug 2018, 8:02 PM IST

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कुमारस्वामी की मुश्किलें बढ़ाएगा सिद्धरामय्या का विदेश प्रवास!

बेंगलूरु. एच डी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली कांग्रेस व जद-एस गठबंधन सरकार तीन बाद 100 दिन पूरे करेगी लेकिन दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में न तो इसे लेकर कोई उत्साह है और ना ही किसी बड़े पैमाने पर जश्न की तैयारी ही। दोनों दलों के बीच मतभेद और विश्वास की कमी के कारण अब भी सरकार की स्थिरता और भविष्य को लेकर राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। दोनों दलों के नेता के भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। हालांकि, सरकार के कार्यकाल पूरा करने का दावा भी कर रहे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या के ताजा बयानों ने सरकार की स्थिरता को लेकर चल रहे कयासों को और भी बढ़ा दिया है। हालांकि, गठबंधन की समन्वय समिति के अध्यक्ष सिद्धरामय्या अपने बयान पर सफाई दे चुके हैं लेकिन दोनों दलों में चल रही गतिविधियां व नेताओं के बयान इस बात का संकेत दे रहे हैं कि सब कुछ सामान्य नहीं है। सिद्धरामय्या के विरोधाभासी बयान भी गठबंधन की मुश्किलें बढ़ा रही हैं।

अब तक पिछले विधानसभा चुनाव को अपने राजनीतिक जीवन का आखिरी चुनाव बताने वाले सिद्धरामय्या न सार्वजनिक तौर पर पिछले सप्ताह फिर से मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जाहिर कर सरकार के अस्थिरता के कयासों को बढ़ा दिया। सिद्धरामय्या ने यह बयान कहीं और नहीं बल्कि वोक्कालिगा बहुल हासन जिले के होलेनरसीपुर में दिया जो कुमारस्वामी व जद-एस के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा का गृह क्षेत्र है। सिद्धरामय्या ने पिछले चुनाव में अपने विरोधियों के हारने के लिए एकजुट होने और अगले चुनाव में जनता के आशीर्वाद से फिर से मुख्यमंत्री बनाने की बात कहकर जद-एस को राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी।

देवेगौड़ा परिवार के साथ सिद्धरामय्या के तल्ख रहे रिश्तों और कुमारस्वामी की कार्य शैली से नाराजगी के कारण सिद्धरामय्या के इस बयान का असर भी दिखा। कुमारस्वामी ने भी इस पर तंज किया। विवाद बढऩे पर सिद्धरामय्या ने सफाई की दी कि वे पांच साल बाद होने वाले चुनाव में सत्ता में लौटने की बात कर रहे थे लेकिन पिछले तीन दिनों से सिद्धरामय्या लगातार इस बात को दुहरा रहे हैं कि जनता उनको फिर से मुख्यमंत्री बनाना चाहती है।

सिद्धरामय्या के बाद अब उनके करीबी समर्थक नेता भी उन्हें मुख्यमंत्री बनाने को लेकर बयान दे रहे हैं। कृषि मंत्री शिवशंकर रेड्डी ने सोमवार को कहा कि पार्टी के विधायक मुख्यमंत्री के तौर पर सिद्धरामय्या को चाहते हैं और ऐसा बदलाव भी हो सकता है। राजनीतिक विश£ेषकों का मानना है कि दोनों दलों के स्थानीय नेताओं के बयानों के बावजूद गठबंधन की डोर शीर्ष नेतृत्व के पास है, जिसके कारण सरकार को तुरंत कोई खतरा नहीं है लेकिन दोनों दलों के बीच इससे खटास ही बढ़ेंगे।


जद-एस के पास अब भी विकल्प
जद-एस नेताओं का कहना है कि अगर कांग्रेस के नेता यह सोचते हैं कि गठबंधन में बने रहना उनकी मजबूरी है तो वे गलत हैं। जद-एस के पास अब भी विकल्प हैं। भाजपा अब भी कुमारस्वामी को अपने साथ लेने के लिए तैयार हैं और जद-एस को भी ऐतरातज नहीं है। लेकिन, कुमारस्वामी सिर्फ कयासों के आधार पर पाला बदलने के पक्षधर नहीं हैं। कुमारस्वामी के करीबी माने जाने वाले एक नेता ने कहा कि सिद्धरामय्या पुरानी बातों को भुला नहीं पा रहे हैं जिसके कारण वे ऐसे बयान दे देते हैं। इस नेता ने कहा कि यह अंदाजा लगा पाना काफी मुश्किल होता है कि सिद्धरामय्या का अगला कदम क्या होगा।

जद-एस के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ ने कहा कि गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री बदलने का कोई सवाल ही नहीं है और कुमारस्वामी पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। विश्वनाथ ने भाजपा के साथ जाने के बारे में पूछे जाने पर कहा कि येड्डियूरप्पा भाजपा का मुख्यमंत्री चाहते हैं, उनके साथ हमारे जाने का कोई सवाल ही नहीं है। उधर, भाजपा नेताओं का कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष बी एस येड्डियूरप्पा गठबंधन में मतभेद को भुनाकर सरकार गिराने के पक्ष में हैं लेकिन पार्टी के नेता इस पर एकमत नहीं हैं।

पार्टी आलाकमान जल्दीबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहता है।
दूसरी तरफ, कांग्रेस नेताओं का एक बड़ा खेमा भी चाहता है कि यह सरकार कम से कम लोकसभा चुनाव तक चले लेकिन सिद्धरामय्या बार-बार अपनी पीड़ा बयां कर गठबंधन की मुश्किलें बढ़ा देते हैं। उधर, सूत्रों का कहना है कि भाजपा भी राजनीतिक उथल-पुथल पर पैनी नजर रख रही है लेकिन वह फिलहाल सरकार को अस्थिर करने का जोखिम नहीं लेना चाहती है। दोनों दलों के कुछ असंतुष्ट विधायक भाजपा के संपर्क में हैं लेकिन यह संख्या सरकार गिराने के लिए पर्याप्त नहीं है। भाजपा फिलहाल देखो और इंतजार करो की नीति पर चल रही है। हालांकि, हालात बदलने पर भाजपा कुमारस्वामी को समर्थन भी दे सकती है।