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भाई के बिना जीवन अधूरा

भाई को वनवास भेजकर मिलने वाला राजसुख उसके लिए जलती हुई चिता के समान था

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भाई के बिना जीवन अधूरा

मैसूरु. साध्वी साक्षी ज्योति ने रविवार को वद्र्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ गुंडलपेट में रविवार को आयोजित धर्मसभा में कहा कि रामायण काल को वर्तमान प्रचलित पंचाग आज से पांच हजार वर्ष पूर्व मानता है। जिसे लोग सतयुग कहते आए हैं। वह युग था भाई-भाई के प्रेम और स्नेह के लिए मर मिटने का। भाई ने अपने छोटे भाई को राजा बनाने लिए चौदह वर्ष का वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया। बड़े भाई का इतना बड़ा त्याग तो छोटा भाई भी कहां कम था।
उन्होंने कहा कि भाई को वनवास भेजकर मिलने वाला राजसुख उसके लिए जलती हुई चिता के समान था, जिस पर जीते जी बैठना तो उसके लिए संभव ही नहीं था।
अत: उसने अपने भाई के राज्य सिंहासन पर भाई की चरण पादुका रखकर उन्हीं की चौदह वर्ष तक पूजा की। ये अनूठा प्रेम था राम और भरत का। संपत्ति, जमीन, जायदाद के बंटवारे को लेकर कई लोग अपने सगे भाई पर मुकदमा कर देते हैं, जेल भिजवा देते हैं। भाई भूखा है तो भाई का दिल नहीं पसीजता है। जिस भाई ने भाई के प्रति प्रेम अपनत्व नहीं, ऐसा भाई धरती पर उपहार नहीं बल्कि भार है। प्रेम में सबका स्तर समान होता है।
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पाप सफलता के मार्ग बंद कर देता है
मैसूरु. स्थानकवासी जैन संघ के तत्वावधान में रविवार को डॉ. समकित मुनि ने कहा कि छल, माया, कपट पाप के कारण व्यक्ति जीवन में कभी आगे बढ़ नहीं सकता है। अपितु उसका पतन ही होता जाता है। इस पाप की आलोचना नहीं करने के कारण व्यक्ति जो करना चाहता है, कड़ी मेहनत के बावजूद नहीं कर पाता है। वह जो नहीं करना चाहता, वह स्वत: हो जाता है। लाख कोशिश के बावजूद व्यक्ति को केवल बद्दुआएं, तिरस्कार और परेशानियां ही हाथ आती हैं और वह यथोचित आदर, सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता है।
मुनि ने कहा कि जो पुण्यवान व्यक्ति होता है, उसे तो सरल, सहज ही मनोवांछित फल मिल जाते हैं, काम परिश्रम में भी अधिक सफलता, यश, कीर्ति, सम्मान और दुआएं मिलती रहती हैं। उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम पुण्यवान, सरल थे और जब वे घर से निकले तो साथ में केवल सीता और लक्ष्मण ही थे लेकिन आगे से आगे उन्हें सुग्रीव, हनुमान, विभीषण आदि अनेक सहयोगी मिलते गए और वे विजयी हुए। यथोचित और अपेक्षित सफलता के लिए माया, पाप की आलोचना आवश्यक है।
भवांत मुनि एवं जयवंत मुनि ने तपस्वियों के प्रति आभार ज्ञापित किया। गौतमचंद सिंघवी ने विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए। कैलाशचंद बोहरा एवं धर्मचंद नंदावत ने लाभार्थियों का
अभिनन्दन किया।