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असुर नहीं, मैसूरु के संस्थापक थे महिषासुर : के.एस. भगवान

असुर रूप की जगह स्थापित हो ध्यानस्थ भिक्षु रूपी प्रतिमा

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असुर नहीं, मैसूरु के संस्थापक थे महिषासुर : के.एस. भगवान

मैसूरु. चामुंडी पहाड़ी पर स्थिति महिषासुर की असुर रूप वाली प्रतिमा के स्थान पर बौद्ध भिक्षु के स्वरूप वाली ध्यानस्थ मूर्ति की स्थापना की मांग जोर पकडऩे लगी है। इस क्रम को आगे बढ़ाया है चर्चित विचारक प्रो. केएस भगवान ने। उन्होंने जोर देकर कहा है कि महिषासुर कोई राक्षस नहीं, बल्कि बौद्ध धर्मावलंबी थे और उन्होंने ही मैसूरु शहर की स्थापना की थी।

बुधवार को उन्होंने कहा कि वास्तव में वर्ग विशेष के दबाव में आकर महिषासुर की असुर रूप वाली प्रतिमा स्थापित की गई थी। प्रोफेसर के साथ मौजूद पेद्देमठ के ज्ञानप्रकाश स्वामी ने कहा कि मैसूरु शहर में राज्य के प्रगतीशील विचारधारा के लोगों की उपस्थिति में 7 अक्टूबर को महिषी दशहरा महोत्सव होगा।

आत्मा में रमण करना ही ब्रह्मचर्य
बेंगलूरु. वीवीपुरम स्थित महावीर धर्मशाला में बारह व्रतों के शिविर में चौथे व्रत की विवेचना करते हुए जयधुरन्धर मुनि ने कहा कि आत्मा में रमण करना ही ब्रह्मचर्य है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य की महिमा इतनी है कि देवता भी ब्रह्मचारी को नमन करते हैं। भोगों से ऊपर उठने वाला ही ब्रह्मचर्य का पालन कर सकता है। भोगों से आज तक किसी को तृप्ति नहीं हुई और होने वाली भी नहीं है क्योंकि ये आग में घी डालने के समान होते हैं।

सभा में 160 से अधिक पुरुष महिलाओं ने चौथा व्रत अंगीकार किया। पुष्पादेवी विमलचंद पितलिया ने आजीवन ब्रह्मचर्य पालन का नियम ग्रहण करने पर संघ अध्यक्ष मीठालाल मकाणा, महिला व बहु मंडल ने उनका सम्मान किया।

जो कुछ मिले, कर्म के उदय का ही फल
मैसूरु. महावीर भवन में जैनाचार्य विजयरत्नसेन सूरीश्वर ने धर्मसभा में कहा कि संसारी जीवों को संसार में जो कुछ सुख मिलता है, जो कुछ भी पांच इंद्रियों के अनुकूल सामग्री मिलती है, लोक में मान सम्मान, इज्जत, प्रतिष्ठा आदि प्राप्त होती है, वह सब कुछ कर्म के उदय का ही फल है। मोक्ष मार्ग के अनुकूल परिस्थितियां सब कुछ पुण्यकर्म के उदय से ही प्राप्त होता है।